भारत में दो धर्म है , दो जाति है । एक अमीर और एक गरीब ।
यही दो तरह के लोग है जो एक त्यौहार को दो तरीको से मानते है । अहा या आह
अहा दिवाली
एक तरफ दिवाली के लिए चिंता है की सजावट कैसी हो , कपडे नए कहाँ से खरीदे जाए ,मिठाइयां और पकवान कितने तरह का हो , पटाखे कितने रूपये के लाये जाए , गिफ्ट महंगे कहाँ मिलेंगे और जुआ खेलने कहा जाए ।
आह दिवाली
दूसरी और भी दिवाली के लिए चिंता है कि खील -खिलोने कहाँ से आये ,बच्चो के नए कपडे कैसे आये , कुछ तो पकवान बन जाए , एक दो पटाखे तो घर ले आये जिससे बच्चो का मन बहल जाए। कहीं से तो थोड़े रूपये मिल जाए जिससे बच्चो के चहेरे पर दिवाली के दिन तो ख़ुशी दिख जाए ।
खैर त्यौहार तो मनआएंगे चाहे अहा दिवाली हो या आह दिवाली
आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाये
{त्यौहार पर यह लेख लिखने का एक कारण था कि आज सुबह ही एक आदमी काम मांगने आया कोई भी काम करने को तय्यार था क्योंकि उसे अपने बच्चो के लिए दिवाली का सामान खरीदना था । और वह अभी मेरे खेत में काम कर रहा है । }