सोमवार, जुलाई 05, 2010

नरेंद्र मोदी के लश्कर ए तैयब्बा से सम्बन्ध उजागर

नरेंद्र मोदी के बारे में जो दबी छुपी बाते थी आज उजागर हो गई . वह है मोदी के लश्कर से सम्बन्ध . अपने साथी नरेंद्र मोदी को फसते देख लश्कर के आतंकी हैडली ने मासूम निर्दोष इशरत जहाँ को अपना साथी बता दिया . यह वही इशरत जहाँ  है जो मोदी के गुर्गो ने फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था . 

बेचारी अदालत और केंद्र सरकार ने इशरत जहाँ  को  मासूम माना था . एक निर्दोष महिला व उसके साथियो को बेहरहमी से क़त्ल कर मोदी ने देश में अशांति फैलाने का काम किया था . नरेंद्र मोदी को कट्टर हिन्दू नेता के तौर पर लश्कर ने ही स्थापित किया जिससे देश में अराजकता फैले . और मोदी को केंद्र सरकार ने जब कटघरे में घेरा तो लश्कर ने अपने साथी को बचाने के लिए उन मासूमो को अपना साथी कहा और अपना फिदायनी तक बताया . यह एक साजिश है फसे  मोदी को बचाने की जो केंद्र और धर्मनिरपेक्ष ताकते कतई बरदाश्त नहीं करेंगी . 

नोट :- यह सब लिखा पर्चा कांग्रेस के एक प्रवक्ता की जेब से रुमाल निकालते समय गिर गया जो १० जनपथ से बाहर निकल रहे        थे . उनके साथ कई स्वनामधन्य टी वी मालिक और पत्रकार भी थे . 







शनिवार, जुलाई 03, 2010

आक्टोपस महाराज की जय

 आक्टोपस महाराज की जय

नए ज्योतिषी आक्टोपस ने पहले भविष्यवाणी कर दी थी जर्मनी  के डिब्बे में बैठ कर की अर्जेंटीना आज हार जाएगा . विश्व कप में लगभग सटीक भविष्यवाणी करने वाले आक्टोपस के संकेत के कारण अर्जेंटीना जैसी टीम ४-० से हार कर घर लौट गई .

क्या यह सम्भव है एक जानवर द्वारा  ज्योतिष जानना . या एक महज इतेफाक है वैसे बहुत से लोग ज्योतिष को महज तुक्का ही तो मानते है . अब ज्ञानी ही बताये क्या सही है . फीफा कप में फुटबाल के अलावा आक्टोपस के तो चर्चे तो है ही .

गुरुवार, जुलाई 01, 2010

और वह फाँसी चढ़ गया ............ आखिर उसे अपनी करनी की सज़ा मिली


वह पूरी जेल में लोकप्रिय था . पूजा पाठी ,कर्मकांडी सब से हँस के ही मिलता था . लोग चकित होते थे वह जेल में क्यों है .कोई नहीं मानता था वह अपराधी हो भी सकता है . उसे क़त्ल के जुर्म में फाँसी की सज़ा हो चुकी थी . और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर मोहर लगा दी थी . राष्ट्रपति से  क्षमा दान के लिए अपील थी इसीलिये वह आम कैदियों के साथ ही रहता था .

सब उसे पंडित जी कह कर बुलाते थे . वह अपने अतीत के अलावा सब बात करता था . बात लगभग ३० साल पुरानी है . पंडित के व्यवहार को देखते हुए उसे तत्कालीन राजनेतिक बन्दियो के साथ जो आपातकाल में जेलों में थे उनके साथ सेवा के लिए रख दिया . पंडित पक्का कैदी था पका मतलब सज़ा याफता . पीले कपड़ो में जब वह भजन गाता था तो उसके चेहरे पर एक ओज सा आ जाता था . राजनेतिक बंदी भी यह मानने लगे थे उसे किसी षड्यंत्र के तहत फसा कर उसे फाँसी के तख्ते पर पहुचा दिया गया है . वक्त के मारे राजनेतिक बन्दियो को उससे हमदर्दी हो गई थी . उसकी मदद के लिए कोशिशे शुरू हो गई . लेकिन तब तक देर हो चुकी थी .

राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका ठुकरा दी . उसकी मौत का दिन मुकर्रर हो गया . फांसी के अपराधी को तन्हाई में रखने के आदेश हो जाते है आज वह आखिरी बार सब कैदियों से मिल रहा था सब उसकी किस्मत पर दुखी थे . एक निरपराध से दिखने वाले  को मौत के मूंह में जाते देख सब को दुःख हो रहा था . तभी एक साथी कैदी ने इन्साफ के खिलाफ ईश्वर को दोषी ठहराया तभी पंडित ने कहा उसके साथ कोई अन्याय नहीं हुआ उसे अपनी करनी की सज़ा मिली है उसने जो अपराध किया उसके लिए तो फाँसी भी सज़ा के तौर पर कम है . यह कह वह हलके हलके तन्हाई की ओर चला गया कभी भी ना लौटने के लिए .

कुछ दिन बाद ही एक सुबह उसे फांसी दे दी गई . कोई उसकी लाश तक लेने नहीं आया क्योकि किसी बात पर उसने अपने पूरे परिवार को मार दिया था .

शनिवार, जून 26, 2010

आपातकाल ---- हमने भी झेला था .

सिर्फ ४  साल का था मैं जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था . आपातकाल  की गाज मेरे घर पर भी गिरी . मेरे पिताजी जनसंघ के पदाधिकारी थे . और हमारे शहर में जनसंघ का ही होल्ड रहा करता था . आपातकाल लागू होते ही सरकार की हिट लिष्ट में मेरे पिताजी भी थे . संघठन के आदेश से पिता जी भूमिगत हो गए और पुलिस का कहर हमारे घर पर वरपा रहा .

चार साल की उम्र में जो मंजर मैंने अपनी आँखों से देखा वह आज तक मुझे याद है . शहर के सबसे ख़ास इलाके में हमारा घर है जो उस समय भी आतंक विरोध की गतिविधियों का केंद्र था . मुझे अब भी रात याद है जब पुलिस ने हमारे घर पर छापा मारा था पुलिस वालो का दीवार पर से कूदना घर के अन्दर कोने कोने की तालाशी लेना सामान को उलट पलट कर देना . मैं ,मेरी माँ, बहिन जो मुझ से दो साल बड़ी है सिर्फ वही घर पर थे .

हमारा चलता हुआ व्यापार  ठप्प  हो गया  . कई  रिश्तेदार  कन्नी  काट  गए  .घर पर रुपया पैसा ख़त्म हो चला था ग्राहक डर के मारे दूकान पर नहीं आते थे लेकिन उस समय कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने हमारे परिवार की मदद की . उनमे एक थे हमारे दूध वाले रामनाथ जिन्हें हम बाबा कहते थे . मेरी माँ ने बाबा से दूध बंद करने के लिए कह दिया बाबा ने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा बेटी पैसा मिले या ना मिले लेकिन बच्चो का दूध बंद नहीं होगा और दो साल तक बिना पैसे के उन्होंने दूध दिया . ऐसे ही थे श्री लक्ष्मण प्रसाद इनकी परचूनी की दूकान थी उन्होंने भी जब सामान का पर्चा नहीं पहुचा तो अपने आप महीने का राशन भिजवाने लगे .ऐसे लोगो का भूलना अहसान फरामोशी ही कहलायेगा .

मेरे पिताजी को  सत्याग्रह कर जेल जाने का निर्देश हुआ . मुझे आज भी याद है पापा सुबह घर आये उस दिन कोई त्यौहार था कई सत्याग्रहियों को गिरफ्तारी देनी थी .लेकिन डर के मारे कोई नहीं आया . पापा अकेले ही घर से नारे लगाते हुए घर से निकले मैं उन्हें बाहर तक छोडने आया . बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और मीसा में बंद कर दिया . जब वह तारीख पर  कचहरी आते थे तब हम लोग मिलाने जाते थे .

किस तरह हमारे परिवार ने वह दिन झेले वह हमारा परिवार ही जानता है लोग डर के मारे पहचानते नहीं थे पड़ोसी नज़र नहीं मिलाते थे . लेकिन हर रात की एक सुबह होती है सूर्य उगा रोशनी हुयी लेकिन दिन आज तक नहीं निकला . आज भी परिस्थितिया आपातकाल की ही तरह है . उस समय तो लाखो लोग विरोध में थे आज अगर फिर ऐसा हुआ तो सत्याग्रही खोजते रह जाओगे . क्योकि सत्य से तो आजकल सब मूहँ फेर लेते है

गुरुवार, जून 24, 2010

जहां जिसकी सरकार वह वहां हावी - दिल्ली मे हाथ और नोयडा मे हाथी


मायावती हाथी लगवाये तो गलत
कांग्रेस हाथ लगवाये तो सही 











इंदिरा गांधी एयर पोर्ट टर्मिनल ३ पर लगे हाथ और नोयडा में लगे हाथी इस बात को दर्शा रहे है कि हाथी की नक़ल हाथ कर ही रहा है . दोनो ही चुनाव चिन्ह है . क्या चुनाव आयोग इस की सुध लेगा या उठी सूंड  हाथी और टेढी उगली हाथ की कह मूहँ  मोड लेगा

चित्र गूगल ,नभाटा से सभार 


शुक्रवार, जून 18, 2010

मुन्ना लाल ....... वह एक कहानी का पात्र नही था . लेकिन कहानी हो गया

दुनिया भर का सामान अपने और गम अपने कंधो पर ढोता था .भिखारी  सा दिखता था लेकिन भीख मांगते किसी ने नहीं देखा . खिचडी बाल बड़ी हुई दाड़ी और खामोशी ओडे दरबदर घूमता रहता था . दो ईट रख बना लिया चुल्हा और एक भगोने में जो मन आया पकाया और खाया . यही दिनचर्या  थी उसकी . लोग उसे मुन्नालाल नाम से जानते थे .

मुन्नालाल को आते जाते कुछ लोग चिडाते थे तो खामोश सा रहने वाला मुन्नालाल फट जाता था दुनिया भर की तमाम गालियाँ बकने लगता था . उसका रोद्र रूप देखकर बच्चे डर जाया करते थे जिसमे से मैं भी एक था . मुन्नालाल के बारे में लोग तरह तरह की बाते करते थे . कोई कहता था वह सरकारी नौकरी में था उसकी बीबी बच्चा मर गया तो वह पागल हो गया और घर बार छोड़ सड़क पर रहने लगा . लेकिन मैंने उसे कभी पागलो की तरह व्यवहार करते नहीं देखा . सिर्फ एक बार वह मेरे घर आया और खाने को सब्जी माँगी . उसके बाद उसने कभी कुछ नहीं माँगा . मुन्नालाल को देखते देखते मैं बड़ा हो रहा था . और मेरे देखते देखते मुन्नालाल बूढ़ा हो रहा था .

किद्ववन्तियों  से घिरा मुन्नालाल  कब लाश में बदल गया पता  जब चला जब कई घंटो तक हलचल नहीं हुई . लावारिस मुन्नालाल अब मर चुका था . पुलिस ने जब उसके सामान की तालाशी ली तो उस सामान में टुडे मुड़े डेढ़ लाख रुपए और दो लाख रुपए की ऍफ़ डी निकली . यह बात पता चलते ही लावारिस मुन्नालाल के कई वारिस सामने आ गए .अब मुन्नालाल किसी का चचा था तो किसी का मामा .  बहुत विवादों के बाद मुनालाल को चिता नसीब हुई . अगले दिन अखवार में एक विज्ञापन छपा था .

बड़े दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है हमारे  पूज्य  श्री मुन्नालाल जी सेवानिवृत डाक बाबू का स्वर्गवास हो गया है . उनका दसवां संस्कार बाग़ ब्रिग्तान में और तेहरवी हमारे निवास में होगी - शोकाकुल राम लाल भतीजा ,जवाहर लाल भांजा .

............................. और पैसे ने रिश्तेदारों को रिश्तेदारी निभाना सिखा दिया .