सिर्फ ४ साल का था मैं जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था . आपातकाल की गाज मेरे घर पर भी गिरी . मेरे पिताजी जनसंघ के पदाधिकारी थे . और हमारे शहर में जनसंघ का ही होल्ड रहा करता था . आपातकाल लागू होते ही सरकार की हिट लिष्ट में मेरे पिताजी भी थे . संघठन के आदेश से पिता जी भूमिगत हो गए और पुलिस का कहर हमारे घर पर वरपा रहा .
चार साल की उम्र में जो मंजर मैंने अपनी आँखों से देखा वह आज तक मुझे याद है . शहर के सबसे ख़ास इलाके में हमारा घर है जो उस समय भी आतंक विरोध की गतिविधियों का केंद्र था . मुझे अब भी रात याद है जब पुलिस ने हमारे घर पर छापा मारा था पुलिस वालो का दीवार पर से कूदना घर के अन्दर कोने कोने की तालाशी लेना सामान को उलट पलट कर देना . मैं ,मेरी माँ, बहिन जो मुझ से दो साल बड़ी है सिर्फ वही घर पर थे .
हमारा चलता हुआ व्यापार ठप्प हो गया . कई रिश्तेदार कन्नी काट गए .घर पर रुपया पैसा ख़त्म हो चला था ग्राहक डर के मारे दूकान पर नहीं आते थे लेकिन उस समय कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने हमारे परिवार की मदद की . उनमे एक थे हमारे दूध वाले रामनाथ जिन्हें हम बाबा कहते थे . मेरी माँ ने बाबा से दूध बंद करने के लिए कह दिया बाबा ने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा बेटी पैसा मिले या ना मिले लेकिन बच्चो का दूध बंद नहीं होगा और दो साल तक बिना पैसे के उन्होंने दूध दिया . ऐसे ही थे श्री लक्ष्मण प्रसाद इनकी परचूनी की दूकान थी उन्होंने भी जब सामान का पर्चा नहीं पहुचा तो अपने आप महीने का राशन भिजवाने लगे .ऐसे लोगो का भूलना अहसान फरामोशी ही कहलायेगा .
मेरे पिताजी को सत्याग्रह कर जेल जाने का निर्देश हुआ . मुझे आज भी याद है पापा सुबह घर आये उस दिन कोई त्यौहार था कई सत्याग्रहियों को गिरफ्तारी देनी थी .लेकिन डर के मारे कोई नहीं आया . पापा अकेले ही घर से नारे लगाते हुए घर से निकले मैं उन्हें बाहर तक छोडने आया . बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और मीसा में बंद कर दिया . जब वह तारीख पर कचहरी आते थे तब हम लोग मिलाने जाते थे .
किस तरह हमारे परिवार ने वह दिन झेले वह हमारा परिवार ही जानता है लोग डर के मारे पहचानते नहीं थे पड़ोसी नज़र नहीं मिलाते थे . लेकिन हर रात की एक सुबह होती है सूर्य उगा रोशनी हुयी लेकिन दिन आज तक नहीं निकला . आज भी परिस्थितिया आपातकाल की ही तरह है . उस समय तो लाखो लोग विरोध में थे आज अगर फिर ऐसा हुआ तो सत्याग्रही खोजते रह जाओगे . क्योकि सत्य से तो आजकल सब मूहँ फेर लेते है