बुधवार, दिसंबर 31, 2008

२००९ आपके द्वार -करे शुभकानाएं स्वीकार

२००९ आपके जीवन मे ढेर सारी खुशियाँ भर दे । नए सपने देखिये ईश्वर उनेह जरुर पूरा करेगा इसी विश्वास के साथ एक बार फिर से नया वर्ष आपको शुभ हो ।

मंगलवार, दिसंबर 30, 2008

सब सुधरेगें जब तीन सुधारे -नेता ,अधिकारी और कानून हमारे

सब सुधरेगें जब तीन सुधारे -नेता ,अधिकारी और कानून हमारे
यह पंक्ति दिमाग मे कही से आई । एकदम सही लगी क्योंकि यह तीन अगर सुधर जाए तो भारत मे सब सुधर जायेंगे । आइये इन तीनो का विश्लेषण करें ।

सबसे पहले हमारे नेता । यदि किसी का नैतिक पतन हुआ है उसमे सब से नम्बर एक पर है नेता नाम के प्राणी । नेता का जिक्र जब पहले होता था तो सुभाष चन्द्र बोस जैसे नेता का फोटो हमारे जेहन मे आता था । और आज ...... छोडिए क्यो समय और दिमाग खराब करें . ऐसा नही की सब नेता भ्रष्ट है ,दुराचारी है ,नाकारा है लेकिन उनकी छवि उनके बीच की काली भेडों ने ऐसी खराब करी कि आज एक गाली हो गई नेता । नए साल में यदि यह नेता नाम का प्राणी कुछ सुधर जाए तो हम यानी समाज भी सुधर जायेगा । मौका है आओ नेता को सुधारे ।

दुसरे नम्बर पर हमारे अधिकारी है जो नेताओं के कंधे का इस्तमाल करके अपना काम चलाते है । नेताओं को पथ भ्रष्ट करके सब निर्णय लेकर देश को आगे न बढ़ने देने में इन अधिकारिओं का भी बहुत बड़ा हाथ है । पब्लिक सर्वेंट का मतलब पब्लिक को अपना सर्वेंट बना कर रखना हो गया है । यदि यह अधिकारी नाम का प्राणी भी अपने मे सुधार ले आए तो देश तरक्की कि राह मे आगे बड जाएगा । ऐसा कोई जप या तप करे नए साल मे जिससे यह अधिकारी सुधर जाए ।

तीसरा कानून बेचारा कानून निरही कानून अगर सुधर जाए तो बहुत सी समस्याए सुधर जाएँगी । मज़बूरी है कानून कि उसे अधिकारी बनाते है नेता पास करके लागू करते है इसलिए कई खामी उसमे जानबूझ कर छोड़ दे जाती है जिससे उसका प्रयोग या कहे दुरपयोग करके अपनों को फायदा दिया जा सके । कानून में कर[ टैक्स ] की विसंगियता भी भ्रष्टाचार को पनपाती है और भ्रष्टाचार हमारी जड़े खोखली करता है इसलिए कानून को सुधारे मजबूत करे जिससे हम मजबूत हो ।

नए साल की पूर्व संध्या पर चिंतन करे मनन करे और प्रार्थना करे कि नेता ,अधिकारी और कानून सुधर जाए ।

शनिवार, दिसंबर 27, 2008

२००९आपके लिए मंगलमय होगा ही होगा।

लो जी २००८ जा रहा है । २००९ आ रहा है .२००९ का साल आपके लिए मंगलमय होगा ही होगा। क्यों ? नही समझे चुनाव का साल है भाई चुनाव का साल ।

२००९ की पहली तिमाही पर आपके घरो मे बड़े बड़े नेताओं की फौज हाथ जोड़े खडे होगी । आप ही आप दिखेंगे इस बीच आपके यहाँ दुर्भाग्य से कोई गमी हो गई चाहे कोई पालतू जानवर की हो बड़े बड़े नेता आपके यहाँ मातमपुर्सी को आयेंगे । लोकतंत्र मे आपके लिए यही कुछ पल है जिस का आप आनंद उठा सकते है इसलिए २००९ आपको मंगलमय होगा ही ।

आप इस उत्सव का आनंद उठाये क्योकि पाँच साल बाद यह उत्सव आया है ।

गुरुवार, दिसंबर 25, 2008

एक मुलाक़ात -अटल जी के साथ [यादो के झरोखे से ]

अटल जी से जो एक बार मिल लेता है वह उस मुलाक़ात को आजन्म याद रखता है । एक मुलाक़ात अटलजी के साथ जो मेरी यादो मे आज भी ताज़ा है । बहुत सालो पहले जब अटलजी सिर्फ़ एक सांसद थे और ६ रायसीना रोड पर रहते थे मैं अपने पिताजी के साथ अटलजी से मिलने गया था ।

शायद इतवार का दिन था उस समय उनके घर पर हमारे आलावा कोई नही था उनके सहयोगी शिवकुमार जी द्वारा हमें सीधे उनके पास भिजवा दिया वहां अटल जी अपने प्यारे पामेरियन के बाल अपने हाथो से सेट कर रहे थे उनकी चिरपरचित मुस्कान लिए उनका चेहरा आज भी ताज़ा है मेरे जेहन मे । बातचीत का सिलसिला चल पड़ा घर परिवार की बातें ,इधर उधर की बातो का लंबा सिलसिला चलता रहा ।

उनके पड़ोसी कांग्रेसी नेता के कुत्ते ने एक बार अटलजी पर हमला किया था उस समय वह विदेशमंत्री बने थे और हमारी मुलाक़ात से कुछ दिन पहले उन्ही नेताजी के कुत्ते ने अटलजी को काट लिया था और चर्चा होने लगी की अब अटलजी प्रधानमंत्री बनेगे इसी बात पर भी मजाक हुई । चाय नाश्ता के बाद हम लोग चलने के लिए बाहर आए। अटलजी भी हमारे साथ साथ आए। उसी समय हमने नई मारुती कर खरीदी थी उसे देख कर बोले क्या कार ली है मैंने भी खरीदी थी भैस के टकराने से उलट गई । उसके बाद उन्होंने एन .इ ११८ खरीदी थी ।

अटलजी जैसा सौम्य ,सरल ,सहज ,अपना सा,सदा प्रसन्न चित व्यक्तित्व बहुत ही कम मिलेगा । ईश्वर से प्रार्थना है मानवता के इस राही को लम्बी आयु .उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करे ।

बुधवार, दिसंबर 24, 2008

कार्टून की भविष्यवाणी सही हुई -नेता हुए बदनाम

कुछ साल पहले जनसत्ता मे एक कार्टून छपा था कि नेताजी जा रहे है और एक बदमाश उनकी जेब मे बैठा है आगे बड़कर वही बदमाश नेताजी के साए मे पीछे चल रहा है उससे आगे वह नेताजी के बराबर मे चल रहा है उससे आगे अब बदमाश आगे है और नेताजी उसके साए मे है और आख़िर मे बदमाश की जेब मे नेताजी बैठे है । दस पद्रह साल पहले का यह कार्टून आज हकीक़त बन गया है । टिकट जब से बिकने लगे बदमाश या कहे माफिया खरीदने लगे और खरीद भी कौन सकता है, [गेहू बेचकर तो टिकट खरीदा नही जाता और इलेक्शन लड़ा नही जाता ] टिकट खरीदा समीकरण या कहे बिरादरी के वोट मिले पैसा फेके वोट खरीदे औए बन गए ऍम.पी .,ऍम.एल.ऐ ।

इसका दुष्परिणाम यह हुआ नेता पद बदनाम हो गया राजनीती अपनी अस्मिता खो गई । और हम लोग अपने आप ही लुट गए । और यह हमारे नए भाग्यविधाता सिर्फ़ एक काम जानते है पैसा बनाना और अय्याशी करना अगर आप दिमाग पर जोर दे तो कई ऐसे नाम आपको याद आ जायेंगे उसमे कुछ लोग तो जेलों की शोभा बड़ा रहे है । और हमारे यह नेता सदनों मे निशब्द रहते है । यानी जो काम के लिए चुने गए उसके आलावा वह सब काम करते है ।

ऐसे ही यशस्वी नेता ने कल एक सरकारी अधिकारी को पीट पीट कर मार डाला क्योकि उस बेचारे ने उनकी नेता के प्रक्टोयौत्स्व पर चंदा नही दिया । यह है कारनामे हमारे अपने बनाये गए अपने भाग्यविधाता के । इनसब कुक्र्त्य मे ऐसा नही की कोई एक राजनितिक दल शामिल है सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे है कोई किसी से कम नही

मंगलवार, दिसंबर 23, 2008

बंदर महिमा -दुविधा मेरी सहायता करे आप

अच्छा ब्लॉग लिखना शुरू किया रोज़ रोज़ कहाँ से लाऊ नए विषय । मन भी नही मानता अंदर से आवाज़ आती है लिखो जरूर लिखो ठीक है साहब लिख रहे है अब आप पढो । एक ताऊ था हमारे यहाँ .... अरे भाई ताऊ , ताऊ का तो पेटेंट है छोड़ो ताऊ को कोई नई कहानी .................. हाँ एक नया हकीकत किस्सा आज ही बीता मेरे ऊपर लिखने लायक है या नही चलिए लिख रहा हूँ ।

किसी ने कहा मंगल को बंदर को चने खिलाओ कई महीने टालता रहा आज न जाने मन में आया कि चलो खिलाये ही देते है आधा किलो चने लिए बंदरो के लिए और चले बंदरो के पास । शहर से मेरे गावं तक रास्ते मे दसिओं जगह पर सैकडो बंदर मटरगश्ती करते रहते है ।

आश्चर्य मुझे एक भी बंदर नही दिखा गाँव तक पहुच कर मन खिन्न सा हो गया । मन मे सैकडो विचार उठे क्यो मुझे बंदर नही दिखे ? आगे रामगंगा नदी है वहां दूसरी तरफ बंदर दिखे लेकिन वह बंदर जहाँ बैठे थे वहां बहुत से चने पहले से पड़े थे और वह उनेह भी नही खा रहे थे । जैसे तैसे मैंने बंदरो को चने डाले उन्होंने उन चनो कि तरफ ध्यान ही नही दिया । थोडी देर मे और बंदर आए उन्होंने वह चने खाए । तब जाकर चैन पड़ा । और लौटते समय मुझे बंदर ही बंदर मिले ।

प्रश्न यह उठता है ऐसा क्या हुआ जो मुझे बंदर नही दिखे और जब दिखे तो चने नही खाए क्या यह कोई संकेत है कुछ होनी या अनहोनी का । आप के पास जवाब हो तो मेरी सहायता करे ।

सोमवार, दिसंबर 22, 2008

देश के प्रति हमारा कर्तव्य सिर्फ़ एक- नेताओं को गाली

एक सुरंग भारत और पाकिस्तान के बीच मे खोद दी गई कहा जाता है तस्करों का काम है । उस समय यह सुरंग मिली जब लडाई की सम्भावना बनी हुई है । यह हमारे होनहारों की मदद के बिना असम्भव है । आइये हम लोग जो एक काम जानते है वह करे नेताओं को गाली दे उनेह बुरा भला कहे हो सके तो जूते मारे और अपनी देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी करे ।

ऐसी कई सुरंगे जो हमारे देश मे सेंध लगा रही है और हम खामोश बैठे है । किसकी कमी उजागर होगी जाच का विषय है लेकिन हमारी सीमा पर लगे सुरक्षा बल क्या कर रहे है यह मनोबल तोड़ने की बात नही गंभीर बात है इतनी सतर्कता के बीच यदि तस्कर आ जा रहे है तो आतंकवादी ,हथियार तो बहुत आसानी से सैर करते हुए हिंदुस्तान को तबाह करने के इरादे से कभी भी आ जा सकते है ।

आतंकी समुंदर के रस्ते आते है जमीन के रस्ते आते है कुछ दिन मे आसमान के रस्ते भी आयेंगे और हम अपनी लोकप्रिय जिम्मेदारी निभाएंगे सिर्फ़ एक ,नेताओं को गाली और हम कर क्या सकते है बेबस है हमारे हाथ मे कुछ नही क्योंकि हम सही निर्णय नही ले पाते । और करे भी क्या हर शाख पर उल्लू बैठा है । सब एक थैली के चट्टे बट्टे है । साँप नाथ नाग नाथ मे से ही किसी को चुनना है । कसम खाए अबकी ऐसा चुने जो काटे नही तो कम से कम फुस्कारे तो ।

शनिवार, दिसंबर 20, 2008

हमारा समाज ईमानदार नही रहा

समय के साथ साथ सब पीछे छूटता जा रहा है जिसमे आदर ,सम्मान ,इज्ज़त ,ईमानदारी जैसी कुछ चीजे भी है । आधुनिकता की अंधी दौड़ उस फिसलन भरे रस्ते पर हो रही है जिस पर एक बार फिसला हुआ व्यक्ति अपनी संस्क्रति अपनी सभ्यता सब भूल जाता है । आज अपने समाज मे कुछ चीजे चौकाती भी है जिसमे एक है ईमानदारी ।

अपने देश मे आज ईमानदारी की घटना अखबार की सुर्खियाँ बन जाती है उस देश मे जहाँ ईमानदारी की गाथाएं भरी पड़ी है इतिहास मे ,कितने प्रसंग है जो आज भी ह्रदय को झकजोर देते है । एक राजा हरिशचन्द्र सपने मे दिए गए अपने वचन को ईमानदारी से पूरा करते है और अपने को अपनी पत्नी को अपने पुत्र को बेच दिया ऐसे कई और उधारण हमारे इतिहास मे धूल फांक रहे है ।

ईमानदारी आज चर्चा का विषय बन गई है क्योंकि हमारा समाज भी ईमानदार नही रहा है । कष्ट तो हो रहा आपको पढने मे मुझे भी समय लगा यह लिखने मे लेकिन यह सच है कि हमारा समाज ईमानदार नही रहा है । अपनी थोडी सी खुशी के लिए हम वह कदम उठा लेते है वह ईमानदारी की परधि मे तो नही आता । इसीलिए एक ऐसा कार्य जो महान नही सिर्फ़ कर्तव्य है और वह ईमानदारी की श्रेणी मे आता है जैसे किसी ने सड़क पर गिर गए १००० रु वापिस कर दिए वह चर्चा मे आ जाता है । और समाचार की सुर्खी बन जाता है ।

यह हमारे समाज के पतन के लक्षण है । अभी भी समय है सम्हलने का वैसे तो ईमानदारी और ईमानदार की वजह से ही हम अस्तित्व मे है। हमारे साथ की सभी सभ्य्ताये समाप्त हो चुकी है । और कहा भी है-
कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी .

शुक्रवार, दिसंबर 19, 2008

देश प्रेमियों तुमने अपने महापुरुषों को भी जातियों मे बाट दिया

आजाद भारत मे हम कई ब्याधियों का शिकार हो गए जैसे जातिवाद , छेत्रवाद ,भाषावाद आदि । लेकिन सबसे दुखद स्थिति तब हुई जब से हमने अपने महापुरुषों को भी जातियों मे बाट दिया । आज इन महान आत्माओं को हम याद तो करते है पर कार्यक्रम इनकी जाति के लोग ही करते है या इनके छेत्र के लोग करते है ।

एक बानगी देखिये किसने किसका ठेका ले रखा है

  • राणा प्रताप - राजपूत समाज
  • शिवाजी - मराठी समाज
  • गुरु गोविन्द सिंह - सिखसमाज
  • महात्मा गाँधी - सरकार
  • सरदार पटेल - गुजराती एवं कुर्मी समाज
  • डॉ अम्बेडकर - बसपाई व जाटव समाज
  • शास्त्री जी - कायस्त समाज
  • सुभाष बोस - कायस्त समाज व उनके मानने वाले
  • चंद्रशेखर आजाद भगत सिंह व उनके साथी - कुछ वह लोग जो देश से प्रेम करते है ।

एक लम्बी सूचि है । यह तो कुछ नाम है पूरी लिस्ट तो ज्यादा भयावह हो जायेगी । इसलिए देश प्रेम सिर्फ़ उस समय न करे जब कोई हमला हो । देश प्रेम हमेशा हमारी रगो मे बहता रहे । इसलिए अपने महा पुरुषों को भेद भाव भुलाकर समान रूप सममान करे क्योंकि इन्होने देश की सेवा की न की जाति की

बुधवार, दिसंबर 17, 2008

इंडिया और इंडियन को दफा करो अपने भारत से

हम भारत देश के रहने वाले है । और हम अपने को भारतीय कहते है , लेकिन अंग्रेजो ने हम पर शासन किया और हमारी पहचान ही बदल दी हमें इंडियन कहा जाने लगा और हमारे देश को इंडिया । इंडियन शब्द दोयम दर्जे का ही प्रतीक होता है । एक कहावत है कि सबसे अच्छा इंडियन मरा हुआ इंडियन है । और हम उस शब्द को ढो रहे है ।

अंग्रेजो कि विकृत मानसिकता की देन थी यह इंडियन शब्द । चाहे इंडियन हो या अमेरिका के रेड इंडियन सब गुलाम ही तो थे । और हम उसी गुलामी की ज़ंजीर मे जकडे अपने को इंडियन कहलाने पर गर्व की अनुभूति प्राप्त करते है । इंडियन एक ऐसा शब्द है जो राष्ट्र प्रेम की भावना को जाग्रत नही कर सकता जो भारतीय या हिन्दुस्तानी शब्द कर सकता है ।

इसलिए इंडियन और इंडिया को अपने भारत से निकाल दो और सिर्फ़ और सिर्फ़ भारतीय कहने मे ही गर्व महसूस करें । एक मुहीम चले अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए इसलिए गर्व से कहो हम भारतीय है । proud to be Bhartiy not indian ।

अगर मेरी आवाज़ मे आपकी आवाज़ मिल जाए तो बहुतो की आवाज़ बन जायेगी यह हमारी इच्छा इंडियन और इंडिया को अपने भारत से निकाल बाहर करने की । इंडियन सुन कर तो ऐसा लगता है की जैसे अपने बच्चे का नाम अंग्रेजी मे कुत्ते का जो नाम होता है वह रख लिया हो ।

यदि देशप्रेम की भावना का संचार करना है तो पहले देश का तो असली नाम ज्ञात हो ।

सोमवार, दिसंबर 15, 2008

रोटी क्या है ?

एक सवाल जो मेरे को आज आंदोलित कर रहा है की -

रोटी क्या है ?

सवाल तो छोटा सा है मैं तो मानता हूँ रोटी पेट भरने की चीज़ है । आपके जेहन में कुछ जबाब घुमे होंगे आइये अनुभव बताए रोटी क्या है ।

रविवार, दिसंबर 14, 2008

आइये इधर आइये , आपका ध्यान किधर है अच्छा वाला ब्लॉग इधर है

आइये आइये आइये इधर आइये , आपका ध्यान किधर है अच्छा वाला ब्लॉग इधर है पढिये पढिये जो लिखा है जैसा लिखा है आपका ही फायदा है । हमारा ब्लॉग वोह सब देगा जिसका आपको इन्तजार रहता है ।

यह है तो हमारा प्रचार लेकिन आपके फायदे है हज़ार । कैसे ? अब आप आही गए है तो मै अपना सीक्रेट बताता हूँ कई महीने का तजुर्बा आप को सुनाता हूँ । शर्त है बस एक आप यह किसी को ना बताएँगे ना ही जो मैं आपको सुना रहा हूँ उसका कोई अर्थ लगायेंगे । क्योकि अर्थ का अनर्थ हो गया तो मुझे महंगा पड़ जायेगा मुझे मेरी बिरादरी से तनखैया कर दिया जायेगा । इसलिए मेरे पेट पर लात न पड़ने पाए कान इधर लाइए हम आपको फायदे गिनाएं ।

फायदा नम्बर १ - आप हमारे ब्लॉग पर एक बार आयेंगे हम आपके ब्लॉग पर कई बार आयेंगे ।

२ - आप हमें एक टिप्पणी करेंगे हम आपको नाम बदल बदल कर कई टिप्पणी करेंगे

३ - आप हमें एक बार पसंद करेंगे हम कई बार आपको पसंद करेंगे ।

४- हम कई ब्लागों से तारतम्य रखते है आपको बहुत जल्दी मशहूर कर सकते है ।

५ - आप हमारे हम आपके फालोवर बन जायेंगे ट्रेफिक देख कर कई ब्लोगेर अपने आप आयेंगे

और भी बहुत है मेरे पिटारे में समय समय पर आपको बताएँगे कुछ दिनों के बाद आप हमारे मुरीद हो जायेंगे और आप यह सब अजमा कर अपने मुरीद बनायेंगे बाकी लोग आपके पीछे पीछे आयेंगे ।

शनिवार, दिसंबर 13, 2008

खुद्दार था वह । यादें जो भुलाये से नहीं भूलती

रोज़ रोज़ जिन्दा रहने की जद्दोजहद मे कट रही अपनी जिन्दगी मे कुछ यादें ऐसी होती है जो चाहते हुए भी हम भुला नहीं पाते है । कुछ अनजान से चेहरे अपनी ऐसी छाप हमारे मस्तिष्क में छोड़ते है जो गाहे बगाहे नजरो के सामने तैरने से लगते है ।

ऐसी ही एक याद मेरा पीछा करती है ,उसकी खुद्दारी के आलावा शायद उसके पास कुछ न था एक आम आदमी इतना स्वाभिमानी हो सकता है मन स्वीकार नहीं कर पाता जबकि आँखों से खुद देखा है ।

पिछले साल की बात है , नए साल के आने की प्रतीक्षा मे कुछ ऐसा किया जाए जो मन के साथ साथ ह्रदय को भी उल्लाह्स का अनुभव कराये राय बनी गरीबो को ठंड से बचने के लिए कम्बल बाटे जाए । समार्थनुसार कम्बल लेकर रात मे निकले जिससे जरूरत मंद ही मदद मिल सके । बस अड्डा ,रेलवे स्टेशन ऐसे ठिकाने है जहाँ ऐसे लोग मिल ही जाते है ।

कुछ लोगो को कम्बल देकर आगे बड़े ही थे , एक ६० साल का बुजुर्ग सूती मोती चादर जिसे खेस कहते है ओड़े ठंड मे ठिठुर रहा था । हमने उसे कम्बल देते हुए कहा बाबा यह ले लो उसने हाथ आगे न करा और ऊपर आसमान की तरफ देखा एक टक देखने के बाद बुदबदाया फिर उसने हमारी तरफ देखा और हाथ जोड़कर बोला बेटा यही मेरी तकदीर है मै इसी मे खुश हूँ यह कह कर आगे बढा और देखते ही देखते भीड़ मे ओझल हो गया । हम लोग हैरान उसे देखते रह गए और ऐसा लगा जैसे हमारे मुहं मे जबान और हमारे पैरों में ताकत न हो ।

आज भी वह बुजुर्ग एक पहेली सा मेरे सामने खडा महसूस होता है । क्या देखा उसने आसमान की तरफ क्या बुदबदाया । लेकिन एक खुद्दार था वह ।

गुरुवार, दिसंबर 11, 2008

भूल गए रास रंग भूल गए हेकडी याद रह गए सिर्फ तीन ब्लॉग ,पोस्ट ,टिपण्णी

क्या लिखे क्या न लिखे इसी दुविधा मे मस्तिष्क के तार आपस मे उलझते रहते है । यह मुगलाता पाल लिया है कि लोग उम्मीद मे बैठे है हम कब लिखे और वह कब पढ़े । दुसरे ब्लोगेर अपने प्रतिद्वंदी लगने लगे है । यह फुरसतिया ,उड़नतश्तरी ,सारथि ,पराया देश ,अलग सा ,मसिजीवी ,दिल कि बात ,स्वप्नलोक ,अगड़म-बगड़म ,प्राईमरी का मास्टर ,अफलातून ,ताऊ रामपुरिया जैसे बड़े बड़े काबिल लोग मुझ से मुकाबला कर रहे है ।

अच्छी बीमारी पाली है चिटठा लेखन , कितना सुखी था जब इन्टरनेट पर इंटरटेनमेंट करने आता था अब तो भूल गए रास रंग भूल गए हेकडी याद रह गए सिर्फ ब्लॉग ,पोस्ट ,टिपण्णी । यह लिखो यह लिखो ज्यादा लोग पढेंगे अब तो सोते सोते पोस्ट का विषय सपने मे आता है और सुबहउठने पर वह भूल जाता है उस विषय को याद करने के चक्कर मे सारा दिन खराब हो जाता है ।

वह तो अच्छा है मेरे लिए कुछ काम नहीं करता हूँ । सुबह गाँव जाकर गाय ,भैस का अपने सामने दूध निकलवा लाओ {ताऊ के लिए -अभी मेरी गाय और भैस ब्याई है और घर मे दूध कि नदीं बह रही है }यही एक जिम्मेदारी है बस । उसके बाद वही सर दर्द चिटठा लिखो । सोचता हूँ यह नशा तो स्मेक से भी ज्यादा घातक साबित हो रहा है लेकिन चिटठा लेखन से मोहब्बत हो गयी है और मोहब्बत में तो चाँद मोहम्मद बन जाऊंगा ।

यह तो हुई आधी हकीक़त आधा फसाना लेकिन सच यह है दिल बहुत हल्का सा महसूस होता है क्योकि दिल के अरमान ,विचार दिल मे न रह कर शब्द का आकार लेकर उन लोगो के सामने होते है जो कद्र करते है दुसरो की भावनाओं की । आप जैसे प्यारे लोगो का साथ ऐसा लगता है जैसे एक परिवार मिल गया अपना सा ।

बुधवार, दिसंबर 10, 2008

आतंक का मुकाबला कौन सा हथियार कर सकता है -- गाँधी गीरी या गोलीगीरी [जबाब दे ]

आतंक का मुकाबला कौन सा हथियार कर सकता है -- गाँधी गीरी या गोलीगीरी

फैसला करे आतंक से आज़ादी किस माध्यम से प्राप्त हो सकती है ।
हमारे पास दो विकल्प है

एक है गाँधी गीरी जिस की प्रसांगिकता पर इस समय संदेह है क्योंकि आतंकी ह्रदय विहीन राछस है उनका उद्देश्य ही है आतंक फैलाना ,शायद गांधीजी के विचार इनका ह्रदय परिवर्तन न कर सके क्योंकि यह लोग अहिंसा की भाषा से दूर दूर तक का रिश्ता नहीं रखते ।

दूसरी है गोलीगीरी जो सदिओं से कारगर हथियार है हमारे शास्त्रों मे भी लिखा है शठे शाठ्यम समाचरेत यानी दुष्ट के साथ दुष्टता ही करनी चाहिए । गोली का जबाब गोली होता है । गोली की बोली समझने वाले सिर्फ गोली की भाषा ही समझते है इसलिए मेरा मानना है गोली गीरी ही आतंक का अंत कर सकता है ।

यह तो मेरी राय है आपकी राय भी जरुरी है आपके विचार क्या है अवगत कराये ।

मंगलवार, दिसंबर 09, 2008

अडवानी जी के नाम खुला पत्र

आदरणीय अडवानी जी
अब भी समय है अडवानी जी यह जान लीजिये १९९२ और २००८ मे बहुत फर्क है । तब से जनता बहुत जागरूक हो चुकी है । आपने भगवान श्री राम का उपयोग करके सत्ता प्राप्त की और उन्ह भुला भी दिया । बेचारे रामलला तो मर्यादा पुरषोतम थे इसलिए टेंट मे रहने के बाबजूद मर्यादा मे ही रहे ।

लेकिन यह आतंक बहुत छठा हुआ मुद्दा है यह आपका साथ न दे पायेगा । इसलिए इस बेकार की बातों मे समय जाया न करे । जनता के भले के बारे मे कुछ सोचे । आतंक से लड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो और वर्तमान सरकार को भी इस मुद्दे पर सहयोग करे ।

अपने पुराने कार्यकर्त्ता जिन्होंने आपको इस लायक बनाया और उनको आपने सत्ता के हवन मे आहूत कर दिया उनका मान सम्मान बरकरार करे ।

और अपनी पार्टी को बड़बोले जनाधारविहीन लोगो से मुक्त करे क्योंकि यही वह आस्तीन के साँप है जो आपके जिन्ना के बयाँ को विवदास्पद बना देते है ।

मैं यह इस लिए नहीं लिख रहा हूँ की मुझे आपसे हमदर्दी है । मैं तो आपका सबसे बड़ा आलोचक हूँ । लेकिन मैं मानता हूँ देश की तरक्की के लिए एक मजबूत विपक्ष का भी होना जरूरी है । और बहुत से सज्जन आपमें सम्भावना देखते है । यदि उनकी मन की हो गई तो देश को प्रधनमंत्री तो मजबूत मिले ।

सोमवार, दिसंबर 08, 2008

हाँ कांग्रेस महंगी पड़ी भाजपा को

आत्म मुग्ध भाजपा को सही झटका दिया है दिल्ली ने । नकारत्मक प्रचार भारी पड़ा भजपा को । अपने हर प्रचार मे शीला दिक्षित की बुराई , आतंक मुंबई काण्ड को ट्रम्प कार्ड की तरह इस्तमाल करने के बाबजूद करारी हार भाजपा को एक थप्पड़ की तरह लगा होगा ।

भाजपा के बड़बोले नेता कहीं खो गए है उनेह खोजे और उन से पूंछे कांग्रेस महंगी पड़ी या आप सस्ते हो गए ।

और भाजपा के एक बुजुर्ग तो विजय प्राप्त नहीं कर पाए , दुसरे का क्या होगा ............... तेरा क्या होगा लाल

शनिवार, दिसंबर 06, 2008

मैं अयोध्या इन्साफ चाहती हूँ

जज साहब
मैं सरयू पुत्री अयोध्या
इन्साफ चाहती हूँ
चार सौ साल पहले मुझे लूटा गया
बलात्कार किया मेरी भावनाओ के साथ
खंडहर कर दिया
मेरी पहचान को बदल दिया
मेरे राम को बेघर कर दिया
तब से आज तक मैं इन्साफ चाहती हूँ
जज सहाब
अगर हिम्मत हो तो इंसाफ करना
नहीं तो मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो
मेरे तो भाग्य मे ही लिखा है
लुटना और पिटना

शुक्रवार, दिसंबर 05, 2008

क्यों जब भगवा बिग्रेड पर कोई संकट आता है तभी कोई आतंकी घटना घट जाती है

यह मजाक है या कुछ और लेकिन बात मे से बात तो निकली है और बात फैलेगी ही ।


एक सवाल

क्यों जब भगवा बिग्रेड पर कोई संकट आता है तभी कोई आतंकी घटना घट जाती है


  1. ताबूत घोटाला जब चरम पर था तभी संसद पर हमला हो गया ।

  2. भगवा सरकार फेल हो रही थी यो कारगिल हो गया ।

  3. चार राज्यों में कमजोर हालत थी तभी मुंबई पर हमला हो गया ।

एक इतेफाक है और यह इतेफाक क्या सोचने को मजबूर कर रहा है , लेकिन यह सही नहीं है , है बिलकुल गलत लेकिन किस किस की जबान पकडेंगे ।


इस जबान के चक्कर मे राम का वनवास हुआ , और सीता को बाद मे घर निकाला ।


क्या अजाब गज़ब है यह सब आये सोचे और चर्चा करे

गुरुवार, दिसंबर 04, 2008

हिन्दू आतंकवादी नहीं हो सकता

एक फ्रेंच सम्पादक का कहना है हिन्दू आतंकवादी हो ही नहीं सकता । फ्रंकोइस गवातिय्र 'ला रेवूय डी लदे' के सम्पादक है जो पेरिस से प्रकाशित होता है । उनका लिखना है भारत मे एक अरब हिन्दू रहते है यानी दुनिया का है छटा आदमी हिन्दू है तथा सर्वाधिक उदार है ।

भारत की अस्मिता व अस्तित्व हिन्दू धर्म पर टिका है । यह देश हिंदुत्व के आध्यात्मक पर आधारित है । आप भारत के लाखो गावों मे जाए तथा एक औसत भारतीय से मिले तो आप पाएंगे कि वे सीधे ,सरल तथा धार्मिक विचारो के होते है । वे भारत के बहुल वाद व उदारवाद मे विश्वास करते है । चाहे आप ईसाई हो या मुस्लिम हो या कोई और सबके प्रति उदारता है यहाँ किसी से दूरत्व का भाव देखने मे नहीं आता ।

हिन्दू धर्म की इस उदारता का परिणाम भारतीय मुस्लिम और ईसाई मे भी दीखता है वे लोग भी अन्य ईसाईयों और मुस्लिमों से भिन्न है । पिछले ३५०० वर्षो के इतिहास मे हिन्दुओं ने कभी किसी देश पर हमला नहीं किया है ,और न ही ताकत के बल पर किसी पर अपने धर्म को लादने का प्रयास नहीं किया है । आप दुनिया मे किसी हिन्दू को कट्टरपंथी नहीं पाएंगे ।

एक बात जो मुझे कहनी है यह लेख पढ़ कर हिन्दू धर्म नहीं है । वेदों ,पुराणों, रामयण, गीता मे कही भी हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है । हिन्दू हिन्दुस्तान की राष्ट्रीयता है । हिन्दुस्तान मे रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है । अरबी भाषा मे स शबद का उचारण न होने के कारण सिन्धु को हिन्दू कहा जाने लगा क्योकि सिंध के आगे रहने वाले सब हिन्दू कहलाने लगे ।

मुझे लगता है हमारी परम्परा , हमारी उदारता हमारी कमजोरी बन गई है ,हमारी दयाशीलता को कायरता समझ लिय गया है । हमें पीड़ित और शोषित मान लिय गया है । समय है हम जागे और अपनी हस्ती को बचाए । क्योकि रोम मिट गया मेसो पोटामिया मिट गया

कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी

बुधवार, दिसंबर 03, 2008

अंतर भारत और इस्राइल की मानसिकता का

इस्राइल से हम कुछ सीखना चाहे तो सीखे उसकी देशभक्ति और उसका अपने देशवासिओं के प्रति आगाध प्रेम और सम्मान ।

मुंबई हमले मे शहीद हुए नागरिको मे इस्राइल के ६ नागरिक थे और उन नागरिको को जो सम्मान उनके देश ने दिया है वह सम्मान हमारे यहाँ के खास शहीदों को भी नही मिला । सारे इस्राइल ने अपने राष्ट्रपति की उपस्थिति मे अपने मुंबई के शहीदों को अन्तिम बिदाई दी । और एक आया जिसने भारत की पन्ना धाय की परम्परा को आगे बढाते हुए अपनी जान पर खेल कर एक दो वर्ष के अनाथ मोशे को बचाया उसका भी ऐसा सम्मान किया जो हमारे यहाँ कल्पना से परे है । और अपने नागरिको की मौत का बदला लेने का प्रण किया और इस्राइल यह कर भो सकता है ।

और दूसरी तरफ़ हम राष्ट्रभक्ति से ओत -प्रोत ,नर मे नारयण का दर्शन करने वाले विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता के वंशज अपने नागरिको की आतंकी हमले मे मौत को हादसा ही मानते है सिर्फ़ सरकारी व्यक्ति ही शहीद माने जाते है और वह भी बेचारे उस सम्मान को प्राप्त नही कर पाते जिसके वह सच्चे हकदार है । हमारे देश मे शायद कुछ ही परिवारों को वह दर्जा मिला है जो एक इस्रायली को अपने देश मे मिला है ।

यही एक अंतर भारत और इस्राइल की मानसिकता का फर्क उजागर करता है । इस्राइल पर एक हमले का प्रति शोध इतना तीव्र होता है की हमलावर देश का राष्ट्रपति को भी वह बंधक बना लेता है । और हम वीर देश के बहादुर लोग चिट्ठी पतरी मे लग जाते है । लिस्ट देते है, वार्ता करते है , हल्की धमकी भी देते है और भूल जाते है कोई हमला भी हुआ था । और अगले हमले पर यही प्रतिक्रिया अपनाते है ।

क्या हम इस्राइल से थोडी हिम्मत ,थोड़ा देश प्रेम ,थोड़ा सम्मान उधार नही ले सकते ? क्या हम अपने अतीत गौरव शाली अतीत से कुछ सबक लेकर कुछ ऐसा कर जाए जिससे दुनिया को यह लगे भारतीयता अभी मरी नही है हिन्दुस्तानी भी अपमान का बदला लेना जानते है ।

हे ईश्वर यदि तुम कही हो तो हम ११० करोड़ लोगो को मानसिक शक्ति प्रदान करो जिससे हम अपने सम्मान की तो रक्षा कर सके ।

मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

हम स्वाभिमानी फिर से कब होंगे ?

समय के साथ साथ दर्द ,आक्रोश ,क्रोध खत्म हो रहा है । सभी बहादुर जिसमे में मैं और आप भी शामिल है अपनी औकात मे पहुच रहे है । वही रास रंग ,किस्से कहानी ,हास्य परिहास्य शुरू हो रहा है।
शहीद सिर्फ अपने घर वालो की ही यादो मे रह जायेंगे , हमारी याददाश्त इतनी नहीं की हम उनेह लम्बे समय तक याद करे क्योकि हम अपने ऊपर हुए अहसान तो याद नहीं रहते यह तो देश की बात है ।
एक प्रश्न जो मुझे परेशान कर रहा है कि हम स्वाभिमानी फिर से कब होंगे ? हमारा खून सफ़ेद हो गया है और ह्रदय पत्थर ।
कौन से अवतार के इंतज़ार मे है हम हिन्दुस्तानी , या कौन सी दुर्घटना हमारी अंतरात्मा को जगायेगी ? इस यक्ष प्रश्न के भी जबाब का इंतज़ार है । मेरी मदद करे

सोमवार, दिसंबर 01, 2008

बिना देश के सैनिक है यह आतंकी पूरी तरह से प्रशिक्षित

बिना देश के सैनिक है यह आतंकी पूरी तरह से प्रशिक्षित । लेकिन इनेह कई देशो का समर्थन प्राप्त है जिसमे से एक देश है पाकिस्तान । ऐसा मुझे लगता है क्योकि इनके आत्मघाती हमले युद्ध के समान है । एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है भारत जैसे देशो के साथ ।

और हम लोग इसे हमला समझ कर हल्के मे ले रहे है यह हमला बम्ब विस्फोट की तरह आसान नहीं । यह संसद हमले की अगली कड़ी है और आगे बहुत जल्दी इसकी पुनरावर्ती होगी । यदि हमारा खुफिया तन्त्र अभी भी नहीं जागा तो हम चिदम्बरम साहब का भी इस्तीफा देखेंगे बहुत जल्दी ।

हर हिन्दुस्तानी को एक सिपाही बनना पड़ेगा तब हम यह ज़ंग जीत पाएंगे । क्योकि यह जंग अद्रश्य दुश्मनों से है जिनका एक ही उदेश्य है भारत की बर्बादी । हमारी मिडिया जिम्मेदार मिडिया {?} इस जंग मे जो अपनी भूमिका निभा रही है वह देश का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है । तरह तरह की नई कहानी पूरे देश को भ्रमित कर रही है । यह काम खुफिया विभाग का है और उसे करने दे उसे समय दे ।

ओर आखिरी बात सबकी जबाबदेही तय हो चाहे वह आम आदमी हो ,नेता हो ,अधिकारी हो ,मिडिया हो ,सरकार हो , धार्मिक नेता हो या कोई भी । क्योकि देश से बड़ा कोई नहीं

रविवार, नवंबर 30, 2008

ब्लोगरो से अपील-- अपनी कलम को हथियार बना, शब्दों में बारूद भरे

अपनी कलम को हथियार बना

शब्दों में बारूद भरे

सोया समाज राख समान

उसमे कुछ आग लगे

ज्योती को भड़का करा

क्रांति जवाला प्रजवलित करे

ब्लोगेर तुम समाज सुधारक

नहीं विदूषक निरे

समय आगया संघर्षो का

आओ तुम नेतृत्व करो

हास्य -परिहास श्रृंगार को कुछ दिन को विश्राम दो

लोकतेंत्र के तीनो स्तम्भ अपने आप ही हिल रहे

अनजाने भय के कारण

समाज भी है डरे हुऐ

सुबिधाओ की बहुतायत में

गुलामी की ओर बहे

रोकना होगा इस धारा को

डट के चट्टानों की तरह

शुक्रवार, नवंबर 28, 2008

लो जी एक एपीसोड खत्म हो रहा है आतंक शो का इस बादे के साथ फिर मिलेंगे इंतज़ार करे ।

लो जी एक एपीसोड खत्म हो रहा है आतंक शो का इस बादे के साथ फिर मिलेंगे इंतज़ार करे । और हम इंतजार करने के आलावा कर भी क्या सकते है । कब नया एपिसोड हो यह पता नहीं लेकिन यह धरावाहिक अभी खत्म होता नहीं दीखता । न जाने कितने नए एक्टर आकर अपनी प्रतिभा दिखायेंगे और लाइव शो कर के न जाने कितनी माँ की कोअख सूनी होंगी , कितने मांगे सूनी होंगी , कितने बच्चे अनाथ होंगे ।

और कितनी सरकारे बनेंगी , कितने वादे होंगे , कितनी कसमे खायी जाएँगी आतंक को खत्म करने को , लेकिन सनातन सत्य यह है की आतंक नामक लोकप्रिय धारावाहिक अभी तो चलेगा । और एक कड़वा सच --

रावन भी तभी मारा गया जब उसने सीता का हरण किया मतलब [ लिखने मे डर लग रहा है ] जब तक संघारक पर खुद नहीं बीतती तब तक लंका पर हमला नहीं होता ।

गुरुवार, नवंबर 27, 2008

अगर आतंक से निजात पानी है तो एक ही रास्ता है पाकिस्तान पर हमला

  • क्या अब भी कसर बाकी है ?
  • क्या यह हमला हमारे कान खोलने को काफी नही है ?
  • कितनी लाशे देखने के बाद हमारी नींद खुलेगी ?
  • क्या हमारा खून पानी हो गया है ?
  • क्या अब भी आतंक की विवेचना करनी पड़ेगी ?
  • क्या पाकिस्तान की साजिश को साबित करना वोट बैंक पर भारी पड़ता है ?

अगर आतंक से निजात पानी है तो एक ही रास्ता है पाकिस्तान पर हमला

बुधवार, नवंबर 26, 2008

शुक्रवार, नवंबर 21, 2008

बिना शीर्षक ..क्या करे शीर्षक लिख कर

कुलबुलाहट सी होती है मन छठपटाता रहता है की कुछ लिखो , विषय मन मे आते है कुछ चर्चित कुछ विवादास्पद। फिर खुद ही डर लगने लगता है क्यों आग मे घी डालूं । लेकिन जो आग लगी है उसे देख कर चुप भी तो नहीं रहा जा सकता । आज के दौर में अपनी कमीज़ साफ कैसे दिखे उस के लिए दुसरे की कमीज़ को गन्दा कर दो का चलन बढ़ रहा है ।

स्वयम को महान साबित करने के लिए दुसरे को बदनाम कर दो । इसी परम्परा के ध्वज वाहक हो गए है नेता ,मिडिया ,यहाँ तक सरकार और पुलिस भी । दूसरो की भावनाओं का बलात्कार करना एक फेशन बन गया है। नोयडा का आरुशी काण्ड हो या प्रज्ञा का इतनी जल्दी अर्थ लगा लिय जाता है चाहे बाद मे उसका परिणाम कुछ निकले ।

आरुशी को रोज़ मारा गया बेचारी बच्ची का चरित्र हनन किया गया ,उसके माँ -बाप को ऐसा गम दिया जो आरुशी के कत्ल से भी ज्यादा गहरे साबित हुए । उस समय मिडिया की भाषा बदल गयी सब टी .आर .पी के चक्कर मे डॉ तलवार को इस अभद्र भाषा में पुकारते थे की जाहिल भी ऐसी भाषा का प्रयोग करने मे हिचकेगा ।

यही जाहिलता कर्नल पुरोहित ओर प्रज्ञा सिंह के साथ हो रही है । अभी यह लोग आरोपित है दोषी नहीं यदि इनका दोष सिद्ध हो जाए उस दिन बीच बाज़ार सूली पर टांग देना । लेकिन यदि निर्दोष साबित हुए तो इनका जो चरित्र हनन हम लोग आज कर रहे उसकी भरपाई केसे करेंगे ।

कर्नल पुरोहित को गाली देने के चक्कर मे हम सेना को गाली दे रहे है उस सेना को जो आजतक अपनी एक साफ़ ,निष्पक्ष छवि बना कर रखी हुई है ,यदि सेना का मनोबल ऐसे ही तोड़ते रहे ओर सेना ह्तौत्साहित हो गई तो उसका परिणाम क्या होगा । सोच कर डर लगा या नहीं

मंगलवार, नवंबर 18, 2008

हो सके तो याद कर लो आज रानी लक्ष्मीबाई का जन्म दिन है


रानी लक्ष्मीबाई --- बुंदेलों हर बोलो के मुहं हमने सुनी कहानी थी ,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी ।
आज इसी वीरांगना का जन्म हुआ । जिसने अपनी हुंकार से अंग्रेजों को लोहे के चने चब्बा दिए । आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाली रानी लक्ष्मी बाई को शत शत नमन ।
आओ उन को भी याद कर लिया करे जिनके बलिदान से हम आज आजाद है ।
शहीद को भूल गए तो हम भी याद नही रखे जायेंगे ।

रविवार, नवंबर 16, 2008

थोड़ा सा गंभीर हो जाए. हम गृह युद्ध के मुहाने पर खडे है

एक ज्वालामुखी सुलग रहा है । धुआं भी उठ रहा है । हम उसे जानबूझ कर अनदेखा कर रहे है क्योकि उसके विनाशकारी परिणाम हमें डरा रहे है और वह ज्वालामुखी है गृह युद्ध ।

जो कार्य अंग्रेज न करा पाये वह काम राजनीति के रुधिर पिपासु अपनी कमियां छुपाने को अपने हिंदुस्तान को गृह युद्ध की ओर धकेल रहे है । इस समय नए नए विवाद प्रयोजित तरह से एक के बाद एक सामने आ रहे है और हम हिन्दुस्तानी रोज़ उनकी परिभाषाएं खोजने में लगे है । रस्सी को साँप और साँप को रस्सी बना कर पेश किया जा रहा है ।

आतंक को धर्म में बाट दिया । बम्ब भी हिंदू ,मुस्लिम ,सिख ,ईसाई हो गया । आतंक और आतंकवादी को उनका धर्म देख कर उन कार्यवाही की जा रही है । जबकि आतंकवादियों को धर्म से कोई सरोकार नही होता । दुनिया का कोई भी धर्म शायद आतंक को मान्यता देता हो ।

जब हमारे यहाँ किसी भी अपराध और वह भी समाज के खिलाफ हुई अपराध की विवेचना धर्म को सामने रख कर होगी तभी समाज विरोधी तत्व भावनाए भड़काकर देश को गृह युद्ध की ओर धकेलेंगे । और हम नादाँ लोग जाने अनजाने उस युद्ध में शामिल हो जायेंगे । क्योंकि हम हमेशा से ही मोहरे बनते रहे सियासत के खिलाड़ियों के ,चाहे १९४७ हो १९७५ हो १९७७ हो १९८४ हो १९९१ हो या २००८

ज्वालामुखी धधक रहा है इसके फूटने से पहले इसका इलाज नही किया गया तो यह बर्वाद कर देगा । क्योंकि हम इस्रायल जैसे मानसिक सक्षम नही है पूरा विश्व चाहता है की हम बर्वाद हो जाए क्योंकि हम विश्व का नेत्रत्व करने की छमता रखते है ।

शनिवार, नवंबर 15, 2008

इंसानियत बीते ज़माने की बात हो जायेगी

इंसानियत बीते ज़माने की बात हो जायेगी
किस्से कहानियो व किताबो में रह जायेगी
इंसानों को खोजना पड़ा तो
वह अजायबघर की किसी अलमारी में पाया जायेगा

ईमान और खुद्दारी
का मतलब कोई न बता पायेगा
इनका जिक्र आया तो
गीता या कुरान में ही आएगा

एहतराम और इज्ज़त
के किस्से सुने जायेंगे
यह भी कुछ होता था
उसे बडी मुश्किल से मान पाएंगे

गुरुवार, नवंबर 13, 2008

भारत का पहला और आखिरी बम्ब धमाका मालेगावं में

भारत एक शांत देश है । यहाँ के नागरिक भोले है [समीर जी के सुसंस्कृत शब्दों के अनुसार ] यहाँ आज तक कोई हिंसा की घटना नही हुई । १९४७ से आजतक धमाके सिर्फ़ दिवाली के पटाखों के रूप में हुए । कश्मीर शांत ,असम शांत ,और तो और कोई नक्सली आतंक नही कोई समस्या नही अमन चैन से रहने वाले भोलो में से बहुसंख्यक जाति के एक सिरफिरी दुर्दांत आतंकवादी प्रज्ञा सिंह ने भारत में पहली बार एक बम्ब माले गावं में फुड़वा दिया । जिसमे पहली बार कुछ लोग शहीद हो गए ।

प्रज्ञा सिंह ने एक अछम्य अपराध किया देश की शान्ति भंग की उसका उसे ऐसा दंड मिलना चाहिए जिससे पूरी दुनिया में एक संदेश जाए कि भारत आतंक के खिलाफ कितना सजग है । और हम भोले लोग आतंक को कभी सहन नही करेंगे । हमारी सेना के कुछ शातिर लोगो ने बम्ब बनाने में सहायता कि उन पर भी कार्यवाही होगी और इस बात कि भी सज़ा मिलेगी बम्ब क्यो बनवाया हम तो बम्ब अपने दुश्मनों पर भी नही चलाते ।

हम शर्मिंदा है भारत के पहले और आखरी बम्ब धमाके के लिए ,सारी दुनिया के चतुर लोगो से छमा चाहते है हम प्रज्ञा सिंह जैसे विषधर को समाप्त करके ही दम लेंगे । जिससे हमारे अफजल जैसे भाई बदनाम न हो ।

बुधवार, नवंबर 12, 2008

गोरी तू मेला देखन नाय जइयो तोको नोच नोच खाय जाएँ

मैं तो मेला देखन जाउंगी मेरे पास पडोसी सब जाएँ
गोरी तू मेला देखन नाय जइयो तोको नोच नोच खाय जाएँ

यह लाइन एक लोकगीत की है जो मेले को जाने की जिद कर रही पत्नी को पति समझा रहा है । मेला एक ऐसा शब्द जो बचपन की यादे ताज़ा कर रहा होगा आपकी, और वह भी गंगा का मेला जो दिवाली के ठीक १५ दिन बाद पूर्णमासी को होता है ।

मेरा गावं श्री गंगा जी के तट पर है और पिछले १५० सालो से वहा कार्तिक मास में गंगा दशहरा के अवसर पर मेला लगता है । आज भी बैल गाड़ियों में सपरिवार आकर लोग तीन चार दिनों के लिए गंगा के किनारे एक रंग बिरंगा शहर बसाते है ,रेत पर तम्बूओ पर रहना ,वही पर खाना बनाना खाना ,गाना बजाना कीर्तन । सब ग्रामीण परिवेश एक नयनाभिराम द्रश्य जो दिल में बस जाता है ।

मेले में रोजमर्रा की घरेलू सामान ,बर्तन ,ढोलक ,चारपाई ,मिटटी के बर्तन ,खिलोने लोग खरीदते है और मनोरंजन के लिए नौटंकी ,झूले ,सर्कस ,खेल तमाशे और मेले में जलेबी न खायी तो कुछ भी नहीं किया ।

और हमारे मेले में सबसे बड़ा आकर्षण है पशु नखासा {बाज़ार } एक से एक नस्ल वाले घोडे ,बैल ,गाय ,भैस ,भैसे और तो और हाथी व ऊठ तक । पशुओं को सजाने के लिए सामान भी मेले में मिलते है ।

एक अद्भुत द्रश्य कभी मौका मिले तो जरूर देखे । गंगा के किनारे जन समुन्द्र और हां पति की बात भी सच हो सकती है । गोरी जइयो संभल के नाय तो तुझे लोग नोच नोच खाय जाय

शनिवार, नवंबर 08, 2008

ओबामा मेरा मामा क्योंकि जितने काले वह मेरे बाप के साले

ओबामा ओबामा ओबामा यह एक आदमी हिंदुस्तानिओं को इतना भा रहा है कि कोई उसे बिष्णु का अवतार न घोषित कर दे । अमरीका का राष्ट्रपति ओबामा हमारी आँखों का तारा हो गया और अभी तो २० जनबरी को शपथ होनी है । लेकिन हम भूल रहे है भेड़ियों के घर में भेड़ पैदा नहीं होती ।

हमारे पडोसी इसलिए बधाई स्वीकार कर रहे है कि उन्होंने ओबामा से अपनी नजदीकी रिश्तेदारी घोषित कर दी है ,वह ओबामा के भांजे बन गए है क्योंकि उनेह लगता है कि जितने काले वह मेरे बाप के साले ,

और तो और ओसामा भी ओबामा के बारे में सॉफ्ट कार्नर है क्योंकि वह भी उनेह अपना सा लगता है । ओबामा की यही शक्सियत तो उनेह यहं तक ले आई है । क्योंकि ओबामा को सब लोग अपना मान रहे है लेकिन कब तक ...................................

गुरुवार, नवंबर 06, 2008

शुक्र है ,मेरे हाथ में पिस्तौल थी .

जितेन्द्र भगत जी की पोस्ट "शुक्र है ,उनके हाथ में पिस्तौल नहीं थी "के बारे में पढ़ा बड़े शहरो के बिगडे नवाबजादे क्या नहीं कर गुजरते । ऊँची सिफारिश रखने वाले बेखोफ़ साड़ कहा किस्से टकरा जाए । किसे नुक्सान पहुचादे पता ही नहीं चलता । इससे मिलता जुलता एक हादसा मेरे भी साथ हुआ ।

मैं ग्रामीण प्रष्टभूमि का शहर में रहने वाला एक किसान हूँ । गाँव से शहर रोज़ आना जाना होता है रात बिरात में भी चलना होता है । अभी थोड़े दिन पहले फसल कट रही थी और किसान का वही एक आधार है आमदनी का ,इसलिए खेत पर देर हो गई रात में १० बजे करीब घर की और अपनी गाड़ी से चला ।

थोडी दूर पर ८ , १० लोग दिखाई दिए जो लूटने के मकसद से खडे थे । उन्होंने मुझे रोकने की कोशिश की और गाड़ी पर ईंट फेक कर मारी जिससे शीशा टूट गया ,शुक्र था मेरे पास अपनी पिस्तौल थी और रुकते ही मैंने फायर कर दिया । मेरे अचानक उग्र हमले से उन में भगदड़ मच गई ,और उनमे से एक लड़के को पकड़ लिया तब तक गाँव से और लोग भी आ गए । पकडे गए लड़के की पिटाई पूजा के बाद पोलिस में दे दिया वहां पता चला वह एक अच्छे घर का लड़का था और पढ़ रहा था ।

उसके भबिश्य को देखते हुए उसकी पहली गलती को माफ़ कर दिया । गलत संगत और मज़े के लिए लड़के ऐसे अँधेरे में प्रवेश कर जाते है वहां से निकलना मुश्किल हो जाता है । भगत जी बच गए की वहां पिस्तौल नहीं थी और मैं बच गया क्योंकि मेरे हाथ मैं पिस्तौल थी ।

मज़बूरी है अपने को बचाने के लिए हमें हथियार रखने पड़ते है । जंगल सा माहौल है सब तरफ जिन्दा रहने के लिए रोज़ कोशिश करनी पड़ती है । क्योकि मर भी तो नहीं सकते ऐसे ,पीछे रोने वालो का क्या होगा .

मंगलवार, नवंबर 04, 2008

इसे क्या कहेंगे -मौत या जिंदगी

मेरे बचपन का साथी ,मेरा दोस्त ,मेरा हमराज ,मेरा भाई क्या नहीं था वह मेरा । साथ साथ खेले साथ साथ पढ़े ,उम्र में कुछ ही तो बड़ा था मुझसे । एक साईकिल पर पूरा शहर घूमते थे ,हमारी दोस्ती मशहूर थी हमारी बिरादरी अलग होने के बाबजूद वह हमारे घर का एक सदस्य था ,मेरी बहिन का बड़ा भाई था ,उसके बच्चो का सगा बड़ा मामा ।

सब कुछ हसी ख़ुशी चल रहा था ,एक दिन वह थोडा बीमार पड़ा ,थोड़े दिन बाद पता चला की उसे मल्टीप्ल सिरोसिस है ऐसे बीमारी जिसका इलाज़ नहीं ,वह क्यों होती है पता नहीं । यानी मौत निश्चित । हल्के हल्के वह मौत की तरफ बड़ रहा था ।

जिंदादिली इतनी कि वह इसका मज़ा लेता था औए कहता था मैं तो साल भर के अंदर मर जाऊंगा लेकिन तुम लोग तो शायद आज ही मर जाओ । मैं मोटा हूँ इसलिए कहता था धीरू को तो कन्धा लगा नहीं पऊंगा इसलिए उस से ही कन्धा लगवाऊंगा । और वह दिन जो निश्चित था आया और उसे अपने साथ ले गया ,उस समय से उसकी याद मेरी दोस्त है । और एक बात उसका नाम था विश्वास

सोमवार, नवंबर 03, 2008

महिला आरक्षण के नाम पर महिलाओं के साथ धोखा ?

एक नई बहस पुराने विषय पर "महिला आरक्षण" ।

पिछले कई सालों से फुटबाल बना यह बिल नेताओं की ठोकरे खा-खा कर अपनी शक्ल भी खो बैठा है । उ।प्र के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने अपने ताजे बयान में आरक्षण में आरक्षण का शिगूफा छोड़ कर बहस को तेज कर दिया । वैसे महिला आरक्षण में आरक्षण राजनाथ सिंह अपने मुख्यमंत्री काल में लागू कर चुके है ।


भाजपा ,कांग्रेस ,कम्युनिष्ट महिला आरक्षण की वकालत तो करते है लेकिन अमल से कोसो दूर है । अभी दिल्ली की विधान सभा प्रत्याशियों की सूची इनकी कलई खोलने के लिए काफी है । ३३% की तो दूर .३% भी तो नहीं दिए महिलाओं को टिकट । महिलाओं के हक की बड़ी -बड़ी बातें करने वाली नेत्रिया भी आरक्षण की जानबूझ कर चर्चा नहीं करती ।

दवी कुचली महिलाओं की आवाज़ सशक्त महिलाएं भी सुनती नहीं चाहे वह सोनिया गाँधी हो वृंदा करात हो ,सुषमा स्वराज हो या मायावती हो । तथाकथित महिला सशक्तिकरण का दंभ भरने वाली भी कान में ऊँगली डाल के बैठी रहती है ।

महिला आरक्षण पर आखरी बहस शुरू होनी चाहिए , आर या पार जो पार्टी इस आरक्षण का समर्थन करती है वह इन विधानसभा चुनाब में अपनी सूची में महिलाओं को स्थान दे , नहीं तो आधी आबादी से माफ़ी मांगे कि हम उनेह बेबकूफ बना रहे है ।

शुक्रवार, अक्तूबर 31, 2008

अहसान फरामोशो क्या सरदार पटेल को भी भूल गए ?


हमें याद नहीं रहा कि आज भारत के लौह पुरुष का जन्मदिन था । उन सरदार पटेल का जिन्होंने खंडित भारत को एकसूत्र में बंधा ,उन तथाकथित शासक जो पाकिस्तान में विलय चाहते थे उनको साम ,भय से भारत में मिलाया । पाकिस्तान से आ रहे लोगो की रक्षा की । भारत को राजा रजवाडो से भी सरदार पटेल ने ही मुक्त कराया ।


बल्लभ भाई पटेल ने किसानो की लिए बारदोली में सफल आन्दोलन किया तभी महत्मा गाँधी ने उनेह सरदार कह कर पुकारा और वह सरदार पटेल के नाम से प्रसिद्ध हुए ।


आज भी भारत को सरदार की आवश्यकता है । सरदार की बात अगर नेहरु मान जाते तो कश्मीर में कोई समस्या नहीं होती ।


सिर्फ आज कुछ लोग पटेल की मूर्ति पर माला पहना कर उनेह याद कर लेते है ,यदि सरदार की नीतियाँ अपना कर आतंक से लड़ा जाए जैसे उन्होंने रजवाडो को खत्म किया वैसे ही हम आतंक को खत्म कर सकते है । यही सच्ची श्र्ध्न्जली होगी सरदार पटेल को ।


और आज हम उन्ही सरदार को भूल रहे है कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं कोई विज्ञापन नहीं

सिर्फ नजरिया [ब्लॉग] में ही सरदार का जिक्र है । अहसान फरामोश नहीं तो क्या कहें अपने को ।

बुधवार, अक्तूबर 29, 2008

क्या ब्लॉग लिखना निठल्लेपन की निशानी है ?

ब्लॉगर बिरादरी से कुछ घायल सवाल

हम समाज के कौन से हिस्से का प्रतिन्धित्व करते है ?
हमारी आवाज कहा तक पहुच रही है ?
क्या हम अपना समय खराब कर रहे है ?
क्या पोस्ट लिखना हमारे निठल्लेपन की निशानी है ?

यह सवाल मुझे आंदोलित कर रहे है , कल मैं एक ब्यूरोक्रेट से मिला और गर्व सहित बताया कि आजकल मैं नियमित ब्लोगिंग कर रहा हूँ तो उनका जबाब था यह तो निठल्लों का काम है आपका लिखा हुआ पढता ही कौन है खुद ही लिखते हो और आपस में एक दूसरो को पढ़वाते हो । दस बीस लोग पढ़ते है दो ,चार टिप्पणी कर देते है । एक सबसे कम प्रसारित अखवार से भी कम पाठक है ब्लॉग के ।

आप लोग अपना समय खराब कर रहे है ,आपकी आवाज़ कम्पुय्टर के अंदर ही रह जाती है ,आप लोग मानसिक विलासता कर रहे हो सिर्फ अपनी कुंठा को जिसे आप अपनी प्रतिभा समझते हो को ब्लॉग में लिख कर अपने को प्रतिष्ठित पत्रकारों ,लेखको व कविओं की श्रेणी में समझते हो ।

उसी समय से उनके तीर रुपी सवाल मुझे परेशानकर रहे है । वैसे उनके कुछ सवाल जबाब के हक़दार है । आये ,सोचे , और जबाब ढूंढे कि हम समाज के किस काम आ सकते है ? आखिर अस्तित्व का प्रश्न है ।

मंगलवार, अक्तूबर 28, 2008

माँ लक्ष्मी से प्रार्थना दिवाली के शुभ अवसर पर

लो जी दिवाली हो गई । पूजा ,पटाखे सब निबटे जा रहे है । माँ लक्ष्मी का आशीर्वाद किसे मिला होगा यह तो अभी पता नहीं चल पा रहा लेकिन मैंने तो एक ही प्रार्थना की है कि हे माता आपने बहुत दिया जीवन को सम्मान पूर्वक बिताने के लिए , आगे आप उसे बढाए न तो कोई बात नहीं लेकिन जो है उसे बरकरार रखें ।

मैं संतुष्ट रहूँ मेरे पैर चादर के अंदर ही रहें ,मैं वह सपना न देखूं जो पूरा न हो सके । मुझे कभी आपका घमंड न हो । और आपका स्नेह ऐसा ही बना रहे ।

बस यही माँगा मैंने माँ लक्ष्मी से ।

रविवार, अक्तूबर 26, 2008

अहा दिवाली -आह दिवाली

भारत में दो धर्म है , दो जाति है । एक अमीर और एक गरीब ।
यही दो तरह के लोग है जो एक त्यौहार को दो तरीको से मानते है । अहा या आह

अहा दिवाली

एक तरफ दिवाली के लिए चिंता है की सजावट कैसी हो , कपडे नए कहाँ से खरीदे जाए ,मिठाइयां और पकवान कितने तरह का हो , पटाखे कितने रूपये के लाये जाए , गिफ्ट महंगे कहाँ मिलेंगे और जुआ खेलने कहा जाए ।

आह दिवाली

दूसरी और भी दिवाली के लिए चिंता है कि खील -खिलोने कहाँ से आये ,बच्चो के नए कपडे कैसे आये , कुछ तो पकवान बन जाए , एक दो पटाखे तो घर ले आये जिससे बच्चो का मन बहल जाए। कहीं से तो थोड़े रूपये मिल जाए जिससे बच्चो के चहेरे पर दिवाली के दिन तो ख़ुशी दिख जाए ।
खैर त्यौहार तो मनआएंगे चाहे अहा दिवाली हो या आह दिवाली

आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाये

{त्यौहार पर यह लेख लिखने का एक कारण था कि आज सुबह ही एक आदमी काम मांगने आया कोई भी काम करने को तय्यार था क्योंकि उसे अपने बच्चो के लिए दिवाली का सामान खरीदना था । और वह अभी मेरे खेत में काम कर रहा है । }

शुक्रवार, अक्तूबर 24, 2008

बीस रूपये का एक पटाखा -याद आयी एक दिवाली

दीपावली का त्यौहार आते ही पुरानी दिवाली याद आती है खासकर बचपन की दिवाली , त्योहारों का असली मज़ा तो बचपन ही उठाता हैशरारते ,शिकायते जब तक हो तब तक त्योहार किस बात काक्या वह दिन थे। एक शरारत जो जिन्दगी भर मुझे याद रहेगी

दिवाली का मौसम ,घर की सफाई रंगाई पुताई चल रही थीउसी समय अलमारी से झाकता एक बीस रूपये का लाल लाल नोट दिल में हल चल पैदा कर रहा था ,तरह तरह के सपने जगाने लगा वह लाल नोट ,चुपके से वह नोट मेने जेब के हवाले कर दियासही में कहे तो चोरी कर लियाउस समय १९७६-७७ में बीस रूपये अपनी अहमियत रखते थे

बीस रूपये कहाँ ऐसी जगह खर्च करुँ कि किसीको पता चले और आनंद भी आयेबहुत सोच कर फैसला लिया कि पटाखे लिए जाये ,उस समय बीस रूपये के पटाखे मायने रखते थेफिर दिमाग में आया एक पटखा बीस रूपये का लिया जाए एक बार में चले और किसी को पता भी चले

घर के पास पटाखे कि दुकानों पर गया और बीस रूपये का एक पटाखा माँगा दूकानदार भी चकराया क्योंकि उस समय बीस रूपये का एक पटाखा नहीं मिलता थामेरी जिद थी कि एक ही चाहिएदूकानदार ने घर पर खबर की, और फिर घर पर हमारी खबर लीयह बचपना मुझे आज भी याद रहता है और वह पिटाई भी

उस समय बीस रूपये का पटाखा नहीं था औए आज २००० रूपये से ज्यादा का भी पटाखा मौजूद है

महंगाई हाय महंगाई

बुधवार, अक्तूबर 22, 2008

उड़नतश्तरी की तहकीकात सर्रर्र ............

ना जाने क्यों मन हुआ कि उड़न तश्तरी की तहकीकात करू । एक आदमी कैसे शरुआत करता है और कैसे कदम दर कदम आगे बढ कर उस जगह पर पहुचता है जहा हर ब्लॉगर पहुचंना चाहता है । उनकी पहली पोस्ट से और उनको प्राप्त पहली टिप्पणी पर उनका धन्यबाद उनकी पकड़ बताता है पूत के पाँव पालने में दिखने लगे थे ।

समीर जी को प्राप्त टिप्पणीयों से इर्ष्या होना सभी ब्लोग्गरों को लाज़मी है क्योंकि
वह आह भी भरते है तो हो जाते है चर्चित
लोग कत्ल भी करते है रह जाते है गुमनाम
लेकिन उनकी मेहनत ,उनका प्रयास ,लाजबाब है । और शोध का विषय इसलिए उड़नतश्तरी की उड़ान पर सरसरी नज़र

सोमवार, अक्तूबर 20, 2008

मुंबई के चूहे हिम्मत हो तो बिल से बाहर निकलो

महाराष्ट्र में चूहों का आतंक बढ़ रहा है खासकर मुंबई में ,और वहां के चूहों ने राजनितिक पार्टी भी बना ली है मनसे ,शिसे जैसी । पता नही बिल में घुस कर चूं-चूं करते यह चाचा भतीजे अपनी आवाज़ को दहाड़ समझ लेते है । जो कलम ले कर पढने वाले बच्चो पर मारपीट कर अपनों को सूरमा समझ लेते है ।

हिम्मत हो ,मर्द हो तो यह चूं -चूं बिल से निकल कर करो आओ दिल्ली वहां बात करो। ऊठ जब पहाड़ के नीचे आता है तब उसको अपनी उचाई का सही पता चलता है । मराठी भाइयों ने तुम्हे खारिज कर दिया है ,यह विष वमन बंद करो । एक बार बिल्ली के भाग्य से झीकां टूट गया था अब कभी सत्ता में मराठी जनता तुम्हारा साथ नही देगी ।

और भाजपा व सहयोगी दलों को चेतावनी है अगर उन्होंने इन चूहों से कोई रिश्ता रखा तो हिन्दुस्तानी जनता उन्हें भी खारिज कर देगी । इसलिये अपनी साख बचाना चाहते हो तो ऐसे समाज तोड़क चूहों से दूरी रखो ।

चूहों का प्रयोग इसलिए की यह लोग ऐसी भाषा का प्रयोग करते है ,और ऐसी भाषा ही समझते होंगे ।

रविवार, अक्तूबर 19, 2008

जबाब चाहिए - तथाकथित बुद्धिजीविओं से

जबाब चाहिए आप लोगो से जो दिमागी घोडे दोडाते रहते है ?
यदि सज्जन ,ईमानदार, जुझारू लोग राजनीति को अछूत मान कर उससे दूर रहेंगे तो देश का भला कैसे होगा ?

आज के समय में आप जैसे पढ़े लिखे लोग जो देश के हित में सोचते है , उसकी तरक्की करना चाहते है ,और जानते है कि लोक तंत्र में चुने गए प्रतिनिधि ही देश के भाग्य विधाता होते है ,राजनीति पर सब कुछ निर्भर करता है । उसके बाबजूद आप लोग वर्तमान व्यवस्था को गाली तो देते हो लेकिन परिवर्तन करने के लिए कोई कदम नहीं उठाते ।

गंदगी को साफ़ करने के लिए गंदगी में घुसना पड़ता है । तभी गंदगी साफ़ हो सकती है सिर्फ यह कह देने से आप लोग बरी नहीं हो सकते कि बहुत गंदगी है और कोई इस साफ़ नहीं कर रहा ।

ऐ पढ़े लिखे मेरे दोस्तों बहुत हो गया अब यह कहना छोडो कि देश को भगत सिंह की जरुरत है अगर आपको लगता है भगत सिंह होना चाहिए तो अपने को भगत सिंह बनाओ । लोकतंत्र में राजनीति के द्वारा ही व्यवस्था परिवर्तन हो सकता है ,इसलिए उसे अछूत न समझ कर उसका त्याग न करे ।

एक सच याद रखे जुल्म करने से ज्यादा जुल्म सहने वाला दोषी होता है ।

शुक्रवार, अक्तूबर 17, 2008

फूलमती -इज्ज़त की खातिर दबंग का सिर काट दिया

भारत की नारी है- राख नहीं चिंगारी है

मायावती के उ .प्र की फूलमती जिसने व्यभिचारी को ऐसी सजा दी कि मजबूत दिल वाले भी हिल गए ।
जिला खीरी के ईसानगर कि फूलमती को उसका दबंग पडोसी अन्नू जुलाहा तीन महीने से उससे छेडछाड़ कर रहा था । दबंग का हौसला इतना बड़ा कि हद पार कर गया , खेत पर काम कर रही फूलमती को अन्नू ने पकड़ लिया औए जबरदस्ती करने लगा ।
अपनी इज्ज़त बचाने को वह चंडी बन गई और गड़ासे से उसका लिंग काट दिया और उसे उसके मुँह में रख कर उसका सिर काट दिया । उसके बाद एक हाथ में कटा सिर और दुसरे हाथ में गडासा लिए अकेली थाने की ओरपैदल चली ।
जिसने यह देखा उसकी रूह काप उठी । ओर उसने कहा "इसलिए खुलेआम सिर लेकर थाने जा रही थी ताकि कोई व्यक्ति किसी औरत से बदतमीजी करने की हिम्मत न कर सके । "

क्या विचार है आप सबका इस बारे में ,कानून अपने हाथ में लेकर फूलमती ने सही किया ?

क्या अब भी नारी को कमज़ोर माना जाए ?

तथाकथित नारी संघटनों का क्या कहना है ?

अमर उजाला से सम्भार

गुरुवार, अक्तूबर 16, 2008

एक समाचार - गौर फरमाएं

समाचार की भीड़ में एक छिपा समाचार ,जेट एयर वेज़ और किंग फिशर पर इंडियन आयल का क्रमश ८२५ करोड़ और ११० करोड़ बकाया है । उधार तेल मिल रहा है उन बड़ी कम्पनियों को जो सेक्डो लाख रूपए विज्ञापन में खत्म करती है ।

सरकार का दोगलापन नहीं तो यह क्या है ? किसान को सब्सिडी पर एतराज ,परेशानी । और उद्योगपतिओं पर मेहरवानी । सरकार बड़े आदमिओं की परेशानी से दुखी है उनेह तमाम तरह की छूट , सुबिधायें मोह्य्या करा रही है ।

और दूसरी तरफ आम आदमी महंगाई के बोझ से मर रहा है । आज तक सरकार ने उसकी राहत के लिए क्या कदम उठाये किसी को नहीं मालूम , उसे क्या सुबिधा दी पता नहीं । क्यों ?

क्योंकि आम आदमी सरकार को चंदा नहीं दे पाता। और वह वोट बिना सोअचे देता है ,और राजनीतिक ताकते उस का वोट उसी पैसे से खरीदने का माद्दा रखती है जो बड़े आदमी चंदे में देता है ।

बुधवार, अक्तूबर 15, 2008

श्रधान्जली सभा में वोट मांगता बी जे पी का गाँधी

राजनीति कैसे संवेदन हीन लोग करते है इसका नमूना एक शोकसभा में देखने को मिला । पूर्व विधायक के निधन के उपरांत हुई शोक सभा में सभी दलों के लोग उनको श्रधान्जली दे रहे थे । तभी एक नए चुनाव छेत्र की तलाश में दरदर भटक रहे बी जे पी की गाँधी और उनके राजकुमार वहा पहुच्ये ।

गाँधी परिवार का ग्लेमर वहा भी चला । पब्लिक उनको देखने को उठी , छोटा गाँधी खुश हो गया । और जब बोलने को खडा हुआ तो भूल गया की उसे क्या कहना है , वह जोर शोर से अपनी माँ के समर्थन की मांग की और वोट की अपील की ।

यह जन्मजात राजनीति करने वाले लोग किसी की भावना ,किसी का दुःख ,किसी का दर्द नहीं समझते केवल अपना फायदा देखते है । और पूरा परिवार सत्ता का सुख उठाना चाहता है चाहे रास्ता कोई भी अपनाए । रुपये का नंगा नाच करते है ,लोगो को खरीदते है ,विकास की बड़ी -बड़ी बातें करते है और करते कुछ नहीं है ।

और नकली गाँधी तो कुछ करते ही नहीं है ,उनेह घोडो ,कुत्तो से ज्यादा हमदर्दी है बजाय इंसानों के ।

मायावती का भी तो यही कहना है गान्धिओं के बारे में

मंगलवार, अक्तूबर 14, 2008

युवाओ का देश -बुजुर्गो का राज, कल भी था और है आज

भारत युवाओं का देश ।

यहाँ पर कुल जनसँख्या का ५०% से ज्यादा युवा है पर सबसे हैरानी की बात है यहाँ के नेता राष्ट्र पति ,प्रधानमंत्री ,कई राज्यों के मुख्यमंत्री और लगभग सभी राज्यपाल की औसत आयु ७० से ८० वर्ष के बीच है ।

और तो और पी ऍम पद के मुख्य उमीदवार मनमोहन सिंह और लाल कृष्ण अडवानी दोनों ८० + है । भारत की दिल दिल्ली के दोनों मुख्यमंत्री पद के घोषित भी ८० के आस -पास

युवा क्या करें ? बुजुर्ग होने का इंतज़ार । जबाब चाहिए क्या युवा इतना परिपक्व नहीं कि वह देश को चला सके

वैसे जवान कन्धे ज्यादा बोझ उठा सकते है ज्यादा देर तक उठा सकते है ।

सोमवार, अक्तूबर 13, 2008

क्या होगा बी. जे. पी. के नारो का

जीतेगा भारत कब जब भाजपा जीतेगी । भाजपा का यह मजाक नहीं तो क्या है ? क्या भारत हार रहा है ? क्या हो गया है भाजपा के नारे लिखने वालो को ?

मानसिक दिवालियापन नहीं तो क्या है यह , राम को ताक पर रख कर अब जीतेगा भारत फिर भारत को भी ताक पर रख देंगे । सत्ता की हवस जितनी भाजपा में प्रबल है शायद और दलों में उतनी न हो ।

भाजपा से इसलिए शिकायत है की वह अपने को अलग पार्टी विथ डिफ रेन्स मानती है । सत्ता के लिए अपनी तथाकथित आदर्शो और नीतियों की हत्या कर उन लोगो से समझोता कर रही है जो चार साल से एक दुसरो को गाली दे रहे थे ।

रविवार, अक्तूबर 12, 2008

मेरा एक्याव्न्वा पत्र ब्लॉग पर {आपका आशीर्वाद चाहिए }

एक दिन ब्लॉग के बारे में पता चला ,पहले पढ़ा फिर लिखने की कोशिश की । शरुआत हुई तुकबंदी भिडाई , अपना दरवार नाम से ब्लॉग बनाया । दरवार नाम इसलिए बचपन से दोस्तों से बैठ कर बाते होती रहती थी पापा से डाट पड़ती थी क्या हमेशा दरवार लगाये बैठे रहते हो कुछ करो ।



पहले के दो तीन चिट्ठे बिलकुल ऐसे थे कि किसी ने कोई तबज्जो नहीं दी । अचानक भड़ास पर लिखा और जैसा देश वैसा भेष जैसा हुआ एक मजाक चर्चा बन गई । भड़ास से निकाला गया लोगो ने साथ भी दिया दुबारा सदस्यता बहाल हुई । यह मेरा टर्निंग पॉइंट था ब्लॉग लेखन में ।



उसी समय कुछ टिप्पणी महान लोगो की मिली जिसमे शास्त्री जी ,समीर जी उड़नतश्तरी ,विवेक सिंह ,परमजीत बाली,फिरदौस खान,सुरेश चंदर गुप्ता ,डॉअनुराग ,सीमा गुप्ता ,संगीता पुरी , दिनेश राय द्विवदी ,रंजन राजन ,रतन सिंह एवं राज भाटिया जी (जिन्होंने अपने पराये देश में मुझे जगह दी )आदि मुख्य है । और उनकी नियमित टिप्पणियों ने मुझे सार्थक लेखन को प्रेरित किया ।

यह में नहीं जानता कि आज कहाँ खडा हूँ लेकिन में एक छात्र हूँ और और अपने वरिष्ठो के द्वारा सीखने कि कोशिश कर रहा हूँ । ५० पत्र ब्लॉग लिख लिए लेकिन में संतुष्ट नहीं हूँ । कुछ कुछ समझ ने कि कोशिश कर रहा हूँ आप सबका सहयोग चाहता हूँ । मेरी मदद करे। और इश्वर से मेरे लिए प्रार्थना करें कि मैं कुछ पहचान बना सकूँ अपनी ब्लोगेर दुनिया में।
आपके आशीर्वाद की प्रतीक्षा में
आपका
धीरू सिंह

शुक्रवार, अक्तूबर 10, 2008

क्या आप जानते है लोक नायक जय प्रकाश नारायण को ?

हमें भूलने की बीमारी है ,सिनेमाओं के फर्जी नायको के आगे हम असली राष्ट्र नायको को भूल जाते है । अमिताभ के आभा मंडल के आगे लोक नायक जय प्रकाश नारायण की पहचान फीकी हो रही है । दोनों का जन्मदिन एक दिन है , अमिताभ के बारे में तीन दिन पहले से अखबारों में छपने लगा ,रेखा के बारे में भी लेकिन लोकनायक .............

भारत के लोकतंत्र का जब कत्ल हो रहा था तब पुराने स्वतंत्रता सेनानी जय प्रकाश नारायण ने एक बार फिर से आजदी बरकरार रखने के लिए युवाओ को साथ लेकर नवनिर्माण आन्दोलन शुरू किया । उस समय एक तानाशाह इंदिरा गाँधी जो मीसा को हथियार बना कर जुल्म कर रही थी उनके खिलाफ एक बुडी आवाज़ ने सारे हिंदुस्तान में जोश भर दिया ।

इंदिरा इज इंडिया ,इंडिया इज इंदिरा कहने वाले भी उस लोक नायक की एक ऐसी क्रांति की उम्मीद नहीं कर रहे थे । आपातकाल के खिलाफ सम्पूर्ण विरोधी दलों को एक प्लेटफोर्मपर लाकर पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन किया ।

लोकनायक ने एक नयी आज़ादी की लडाई लड़ी,और जीती

लोकनायक के चेलो ने उन्हें जिन्दा पर ही भुला दिया । और उनके जिन्दा रहते हुए संसद में शोक सन्देश प्रसारित कर दिया ।

और आज लोक नायक के द्वारा निर्मित नेता केंद्र सरकार में मंत्री है ,राज्य के मुख्य मंत्री है फिर भी वह उनेह याद नहीं करते और जनता उसकी तो यादाश्त बहुत कमजोर होती है , गाँधी के बाद जय प्रकाश नारायण ने ही भारत को बचाया ।

हम लोक नायक जय प्रकाश नारायण को भूल गए ,क्रप्या उनेह याद करे । ११ अक्टोबर को उनका भी जन्म दिन है ।

गुरुवार, अक्तूबर 09, 2008

आओ राम बन आतंक रूपी रावण का संहार करे

विजयादशमी पर आओ हम यह संकल्प करे ,

आतंक रूपी रावण का राम बन संहार करे ।

हनुमान की भांति हम अपनी शक्ति भूल गए ,

आओ सोई शक्तियों को जगाने का आव्हान करे ।

अपने क्रोध की ज्वाला को इतना आज प्रवल करे ,

आतंक रूपी रावण का हम आज ही दहन करे ।

कलयुग में किसी चमत्कार की आशा बिलकुल न करे ,

आओ राम बन आतंक रूपी रावण का संहार करे ।

मंगलवार, अक्तूबर 07, 2008

स्कूटर में तेल डलाने के पैसे नहीं -सपने नैनो के

भारत के सबसे बड़े सपनो के सौदागर रतन टाटा ने नैनो नामक सपनीली कार के द्वारा आम आदमी को कार का सपना दिखा कर उसके साथ एक मजाक के आलावा कुछ नहीं किया है । यही मजाक संजय गाँधी द्वारा ८० के दशक में मारुती के रूप में आम आदमी के साथ किया, लेकिन मारुती ने भारत में कार क्रांति की शरुआत तो की ।

१ लाख की कार नैनो दुनिया भर में चर्चा का विषय है अपनी कीमत से और अपने बनने वाली जगह को लेकर । सिंगुर को अमर कर दिया नैनो ने .ममता को फिर से चर्चा में ला दिया नैनो ने ,कामुनिस्ठो के पूंजीपति प्यार को दर्शा दिया नैनो ने ।

लेकिन आम आदमी की कार आम आदमी के द्वारा प्रोयोग हो सकेगी इस पर एक प्रश्न चिन्ह है । १ लाख से यह कार १ लाख २५ हजार की हो गई आते आते १५०००० की हो जायेगी एसी उम्मीद है । उसका पेट्रोल का खर्चा क्या आम आदमी उठा पायेगा वह आम आदमी जो अपने स्कूटर में पेट्रोल नहीं डला पा रहा है ।

आज सरकारे टाटा की नैनो के लिए रतन टाटा की चरण बंदना कार रही है । नरेंदर मोदी सच्चे भक्त साबित हो गए है और टाटा का सानिद्य और आशीर्वाद उनेह प्राप्त हो गया है ।

टाटा का सपना तो पूरा हो गया ,आम आदमी के सपने की परवाह किसे है । आम आदमी को आज भी कार से ज्यदा रोटी ,कपडा ,और मकान की आवश्यकता है जो ६३ साल के बाद भी सपना सरीखा ही है ।

सोमवार, अक्तूबर 06, 2008

हर साल जलता है फिर भी रावण कभी नहीं मरता है

रावण फिर अट्टहास कर रहा है
दशहरे पर जलने के लिए मचल रहा है
क्योंकि
उस दिन वह फिर से नया जन्म लेता है
अपनी आसुरी शक्तियों को नई शक्ति देता है
त्रेता से आज तक
हम रावन को हर साल जलाते है
लेकिन उसे मार न पाते है
क्योंकि
वह हमारे भीतर पलता है
इसलिए
हर साल जलने वाला रावण
फिर भी नहीं मरता है

शुक्रवार, अक्तूबर 03, 2008

अरे तुम तो मुझ से बड़े पागल लगते हो

एक पगलिया जो एक पहली सी लगती थी
सारे शहर में पत्थर लिए फिरती थी
न जाने कब वह बिगड़ जाती थी
हाथ में पत्थर लेकर लोगो को दौड़ती थी
भयभीत जनता सहम जाती थी
उसे देखते ही सडके खाली हो जाती थी
एक दिन हमारी किस्मत खराब थी
वह सड़क पर हमारे साथ थी
उसका रौद्र न्रत्य चालू था
उसका हाथ का पत्थर डरा रहा था
चोट न लग जाये लोगो को भगा रहा था
हमें अपनी मर्दांगनी का जोश चढ़ गया
हमने भी एक पत्थर हाथ में उठा लिया
वह यह देखकर जोर से हसीं
बोली यह क्या करते हो
अरे तुम तो मुझ से भी बड़े पागल लगते हो

गुरुवार, अक्तूबर 02, 2008

बापू अलविदा ,अब अगले २ अक्तूबर को याद करेंगे


बापू इस साल की छुट्टी के लिए धन्यबाद । अब अगले साल इसी दिन का इंतजार रहेगा उसी दिन फिर से याद कर लेंगे । अबकी बार खास मज़ा नहीं आया क्योंकि ईद भी इस दिन पड़ गयी ,एक छुट्टी कम हो गई ।


वैसे बापू किसी भी बहाने हमने याद तो किया । बापू हमें माफ़ करो हम आपको भुला रह है । हम शर्मिंदा है अपने इस कुक्र्त्य पर , परन्तु हम क्या करे बापू हम चाहे तो भी कुछ नहीं कर सकते क्योंकि हम अहसान फरामोश हो गए है ।


बापू बप्पा मोरया - अगले वरस तू जल्दी आ