मंगलवार, नवंबर 04, 2008

इसे क्या कहेंगे -मौत या जिंदगी

मेरे बचपन का साथी ,मेरा दोस्त ,मेरा हमराज ,मेरा भाई क्या नहीं था वह मेरा । साथ साथ खेले साथ साथ पढ़े ,उम्र में कुछ ही तो बड़ा था मुझसे । एक साईकिल पर पूरा शहर घूमते थे ,हमारी दोस्ती मशहूर थी हमारी बिरादरी अलग होने के बाबजूद वह हमारे घर का एक सदस्य था ,मेरी बहिन का बड़ा भाई था ,उसके बच्चो का सगा बड़ा मामा ।

सब कुछ हसी ख़ुशी चल रहा था ,एक दिन वह थोडा बीमार पड़ा ,थोड़े दिन बाद पता चला की उसे मल्टीप्ल सिरोसिस है ऐसे बीमारी जिसका इलाज़ नहीं ,वह क्यों होती है पता नहीं । यानी मौत निश्चित । हल्के हल्के वह मौत की तरफ बड़ रहा था ।

जिंदादिली इतनी कि वह इसका मज़ा लेता था औए कहता था मैं तो साल भर के अंदर मर जाऊंगा लेकिन तुम लोग तो शायद आज ही मर जाओ । मैं मोटा हूँ इसलिए कहता था धीरू को तो कन्धा लगा नहीं पऊंगा इसलिए उस से ही कन्धा लगवाऊंगा । और वह दिन जो निश्चित था आया और उसे अपने साथ ले गया ,उस समय से उसकी याद मेरी दोस्त है । और एक बात उसका नाम था विश्वास

4 टिप्‍पणियां:

  1. जिंदादि‍ली से जीने का नाम ही जिंदगी है, और आपके 'वि‍श्‍वास' की बेफि‍क्री अलमस्‍त थी, वर्ना मरने का खौफ कि‍से नहीं होता।

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  2. मौत सामने खडी देखकर इतनी जिंदादिली दिखा सकें ऐसे कम लोग होते हैं .भावुकतावश आँखों में आंसू आ गए . ईश्वर मरने वाले की आत्मा को शान्ति दे . आप सभी को उनकी कमी सहने की ताकत दे .

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  3. जाने वाले चले जाते हैं और कितनी यादें छोड़ जाते हैं. तकलीफ तब और बढ़ जाती है जब जाने वाले को पहले से पता हो. बहुत जिंदादिल दोस्त था आपका. नमन.

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  4. " sach kha jindgee to bevfa hai ek din thukrayge ....... jane wale chle jateyn hain dukh or yadein chod jateyn hain...... very painful to read.."

    Regards

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा