बुधवार, जून 02, 2010

बुलंद दरवाज़ा और मैं



गर्मियों की छुट्टी पर तीर्थ यात्रा  के लिए मेहंदीपुर बालाजी ,मथुरा ,ब्रन्दावन के लिए हम लोग निकले . बालाजी से लौटते हुए भरतपुर में रास्ता भटक गए मुड़ना था मथुरा की ओर और चले गए आगरा की ओर . और पहुच  गए २० किमी दूर फतहपुर सीकरी -जहाँ हम लोग बुलंद दरवाज़े से होते हुए बाबा सलीम चिश्ती की मज़ार पर सजदा के लिए चले गए . एक ऐसी जगह जहाँ अकबर भी आता था मागने . और बाबा के आशीर्वाद से ही अकबर को जोधाबाई से एक पुत्र हुआ जिसका नाम रखा सलीम जो आगे चल कर जहांगीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ '

यह है बुलंद दरबाजा 


यह है सलीम शेख चिश्ती की दरगाह 



हमने भी किया  सजदा और चडाई चादर . कहते है यहाँ हर मुराद पूरी होती है 



 बुलंद दरवाज़े का पीछे का हिस्सा 


यह वह दरवाज़ा जिससे अकबर आता था 



बाबा सलीम चिश्ती के परिवारियो की कब्रे 

और यह मेरा परिवार 

फोटो में जो तारीख दिख रही वह गलत है 

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर चित्र....मैंने तो १९७३ में यह बुलंद दरवाज़ा देखा था

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  2. बहुत सुंदर जी हम भी पांच साल पहले यहां आये थे

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  3. जब बुलंद दरवाजा पर घूम आये हैं, तो उसी बुलंदी को जीवन में ला सकें, यही ईश्वर से प्रार्थना है ।

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  4. धीरू जी ... इन लाजवाब चित्रो के साथ आपने फ़तह पूर सीकरी की यादें ताज़ा कर दी .... आपके परिवार से मिलना भी बहुत अच्छा लगा ...

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  5. Baujee acchhe chhayachitr!
    Bulandee chhuen aap, yehi dua hai!
    Aur haan parivaar ke badon ko namaste aur chhoto ko pyaar!
    (Main 25 saal ka hoon, kripya apne aap adjust kar lein, kise kya dena hai!!!)
    Ha ha ha.....

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  6. दुआ करता हूँ आपकी मुरादे जल्द पूरी हो | आमीन !

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति !

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  7. धीरु जी,
    "हमने भी किया सजदा और चडाई चादर . कहते है यहाँ हर मुराद पूरी होती है"
    जबकि आप के पास सब कुछ है गाडी ,बंगला ,पैसा , शोहरत....
    चित्र तो बुलंद है,पर आपका भ्रमण मात्र एतिहासिक दर्शन नहीं था!
    आपके पिछले लेख "अगर हिंदु हो तो शर्म करो" से मेल नहीं खाता।

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा