गुरुवार, दिसंबर 11, 2008

भूल गए रास रंग भूल गए हेकडी याद रह गए सिर्फ तीन ब्लॉग ,पोस्ट ,टिपण्णी

क्या लिखे क्या न लिखे इसी दुविधा मे मस्तिष्क के तार आपस मे उलझते रहते है । यह मुगलाता पाल लिया है कि लोग उम्मीद मे बैठे है हम कब लिखे और वह कब पढ़े । दुसरे ब्लोगेर अपने प्रतिद्वंदी लगने लगे है । यह फुरसतिया ,उड़नतश्तरी ,सारथि ,पराया देश ,अलग सा ,मसिजीवी ,दिल कि बात ,स्वप्नलोक ,अगड़म-बगड़म ,प्राईमरी का मास्टर ,अफलातून ,ताऊ रामपुरिया जैसे बड़े बड़े काबिल लोग मुझ से मुकाबला कर रहे है ।

अच्छी बीमारी पाली है चिटठा लेखन , कितना सुखी था जब इन्टरनेट पर इंटरटेनमेंट करने आता था अब तो भूल गए रास रंग भूल गए हेकडी याद रह गए सिर्फ ब्लॉग ,पोस्ट ,टिपण्णी । यह लिखो यह लिखो ज्यादा लोग पढेंगे अब तो सोते सोते पोस्ट का विषय सपने मे आता है और सुबहउठने पर वह भूल जाता है उस विषय को याद करने के चक्कर मे सारा दिन खराब हो जाता है ।

वह तो अच्छा है मेरे लिए कुछ काम नहीं करता हूँ । सुबह गाँव जाकर गाय ,भैस का अपने सामने दूध निकलवा लाओ {ताऊ के लिए -अभी मेरी गाय और भैस ब्याई है और घर मे दूध कि नदीं बह रही है }यही एक जिम्मेदारी है बस । उसके बाद वही सर दर्द चिटठा लिखो । सोचता हूँ यह नशा तो स्मेक से भी ज्यादा घातक साबित हो रहा है लेकिन चिटठा लेखन से मोहब्बत हो गयी है और मोहब्बत में तो चाँद मोहम्मद बन जाऊंगा ।

यह तो हुई आधी हकीक़त आधा फसाना लेकिन सच यह है दिल बहुत हल्का सा महसूस होता है क्योकि दिल के अरमान ,विचार दिल मे न रह कर शब्द का आकार लेकर उन लोगो के सामने होते है जो कद्र करते है दुसरो की भावनाओं की । आप जैसे प्यारे लोगो का साथ ऐसा लगता है जैसे एक परिवार मिल गया अपना सा ।

25 टिप्‍पणियां:

  1. आप जैसे प्यारे लोगो का साथ ऐसा लगता है जैसे एक परिवार मिल गया अपना सा ।
    ये आखिरी लाइन सबको पीछे छोड़ने के लिए काफी है ... बहोत ही बढ़िया किया दिल की बात को शब्दों में ढल दिया ... अच्छी बात है दिल हल्का हो गया .... बधाई आपको. साहब...

    अर्श

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  2. "सर दर्द चिटठा?
    इस नाम का भी कोई चिट्ठा लिखते हैं क्या आप ? उसका पता क्यों नहीं देते?

    धन्यवाद इस प्रविष्टि के लिये.

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  3. क्या बात है? क्या बात है? क्या जलवे हैं। अरे भैया धीरू, लिखे रहो। ये फ़ुरसतिया-उरसतिया कौन चीज हैं तुम्हरे आगे। सब पानी भरके पियेंगे खुदै। सेल्फ़सर्विस का जमाना है न!

    मजेदार पोस्ट! लिखते रहें। मस्त ,बिंदास।

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  4. बढ़िया लिख रहे हैं । सिर दर्द हो तो नदी में से एक गिलास दूध भरकर पी लीजिए, बिल्कुल ठीक हो जाएगा । भैंस व गाय को हमारी बधाई ।
    घुघूती बासूती

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  5. वैसे मुकाबले में कुछ स्त्रियाँ भी हैं, भूल गए क्या ?
    घुघूती बासूती

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  6. प्रतिद्वंदी न मानो, साथी. सेम वार्ड में सेम बीमारी से ग्रसित बीमार ही मानो..लाइलाज बीमारी के मरीज का दूसरा मरीज ही सहारा होता है. :)

    सही है, लगे रहिये.

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  7. हाँ यह धूमकेतु दिखा है सहसा ! शुभकामनाएं !

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  8. गाड़ी सही ट्रैक पर जा रही है। बहुत जल्द आप भी समझिए कि छाने वालों में शुमार होने जा रहे हैं बन्धु। अग्रिम शुभकामनाएँ।

    गाय का सूतक पूरा हो जाए तो छक कर सोइए एक दिन, क्योंकि एक एक कर ब्लॊगर्ज़ अनिद्रा का शिकार होते जा रहे हैं। इस अनिद्रा रोग का ईलाज बहुत जरूरी जान पड़ता है, ब्लॊग-जगत् व उनके हित में.

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  9. क्योकि दिल के अरमान ,विचार दिल मे न रह कर शब्द का आकार लेकर उन लोगो के सामने होते है जो कद्र करते है दुसरो की भावनाओं की ।
    " wah. what a positive and appreciable thoughts.."

    Regards

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  10. बहुत सुंदर लिखा धीरू भाई!. समीरलाल (ऊडन तश्तरी) जी ने बड़ी अच्छी बात कही है. जब सब एक से हैं तो फिर प्रतिद्वंदी कौन? आभार.

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  11. हमें भी आप जैसे प्रतिस्पर्धी से डर लग रहा है. :)

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  12. अरे उड़न तस्तरी जी बीमारी और वर्ड भले ही सेम हों पर हल चाल पूछने वाले तो कम जियादा हो जाते हों न
    चढा उतरी नही होगी?

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  13. धीरू जी ....हमने तब भी कहा था अब भी कहते है....".जो अच्छा लगे उसे पढ़ते है......बाकी सब कहानी है.."..ओर आप भी अच्छे लगते है ......ओर हाँ ये अच्छे ओर काबिल लोगो का जो बोरा आपने सुबह सुबह हमारे आँगन में फेंका है .उसे उठवाने के लिए किसी को भिजवाये ....इतना वजनी है की गड्डा हो गया है....

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  14. धीरूभाई अच्‍छा लिखा है और आपकी एक बात और अच्‍छी लगी कि आपने ब्‍लाग जगत को परिवार बोला
    धन्‍यवाद

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  15. चिंता की कोई बात नहीं है धीरू भाई, इस बीमारी के मरीज बढ़ते ही जा रहे हैं, बल्कि यह तो छूत की तरह फ़ैल रही है, जल्दी ही "हिन्दी ब्लॉगिंग" नाम की महामारी हो जायेगी, फ़िर इसके लिये भी एकाध NGO खुलेगा और सरकार से अनुदान लेगा… हम भी इसी बीमारी के शिकार हैं, आप भी हो गये अच्छी बात है…

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  16. धीरु जी,
    आपकी साफगोई सदा दिल को छूती है। यह जो हम सब 'बिन देखे अपनों' का परिवार है, उसमें सदा आत्मियता बनी रहे। यही कामना है।

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  17. भई, कमेंट की कमेंटरी बहुत दूर तक चली गई\ आ गए ना हम भी आपके ‘प्यारे लोगों’ में। लिखते-लिखाते, बढते-बढाते, ठेलते-ठेलाते मस्त-बिंदास रहिए। अच्छी पोस्ट को पालते-पोस्ते रहने के लिए बधाई।

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  18. क्या लिखे क्या न लिखे इसी दुविधा मे मस्तिष्क के तार आपस मे उलझते रहते है । यह मुगलाता पाल लिया है कि लोग उम्मीद मे बैठे है हम कब लिखे और वह कब पढ़े ।
    -------------
    हर चिठेरा इस उहापोह से गुजरता है। वह न लिखे तो कल क्या होगा दुनियां का!
    बढ़िया लिखा जी!

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  19. धीरु भाई,मै हमेशा कहता हुं कि मै किसी आदत का गुलाम नही..... लगता है मै झुठ बोल रहा था, अब पता नही यह बांल्ग आदत है या बिमारी.... लेकिन हम सब है पागल... क्योकि इस से मिलता तो कुछ नही.... लेकिन जेसे कुत्ते के मुहं मे हड्डी लग जाये ... तो वो बहुत खुश रहता है किसी गलत फ़मी मै, वोही हाल हम सब का है....
    अगर किसी से दुशमनी निकालनी हो तो उसे बांलगर बना दो.
    धन्यवाद

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  20. मेरी हालत बता रहे हैं या अपनी :)

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  21. किसी सयाने आदमी ने कहा किसी से दुश्मनी निकालनी हो तो उसे चुनाव लङवादो,घर मे एक घोङी बंधवादो,शराबी बनादो या फ़िर बलोगिन्ग सिखा दो । इस रोग का कोइ एन्टी वेक्सिन अभी तक नही बना है

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा