शनिवार, जनवरी 05, 2013

मोमबत्ती तो जल कर बुझ गई 
तनी मुट्ठी तो  अब खुल  गई 
बहुत आग थी दिलो में उस समय 
समय के साथ वह राख हो गई 

दामिनी थी या वह अनामिका 
वह  लड़ी और बहादुरी से मर गई 
अपने पीछे वह छोड़ गई एक सवाल 
 कब तक लड़की  ऐसे ही  मरेगी  


सोमवार, अक्तूबर 15, 2012

आज मेरे पिता जी का ७५ वां जन्मदिन है

   आज मेरे पिता जी का जन्मदिन है . जीवन के सफलता पूर्वक 75 साल बिना किसी आक्षेप  के एक उपलब्धि ही कही जायेगी . आज उनका अमृत समारोह आयोजित किया गया . हमारे क्षेत्र के सर्वदलीय व् सर्वसमाज के  प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया जो आज के दौर में अकल्पनीय है .


बुधवार, अक्तूबर 10, 2012

मैं जिन्दा हूँ

मैं जिन्दा हूँ . यह बात मैं जानता हूँ शायद मेरे ब्लॉग पर आने वाले समझ न बैठे की मैं कहीं मर तो नहीं गया इसलिए अपनी गलती सुधारने के लिए   नियमित अंतराल से फिर से ब्लॉग लिखने का निश्चय कर लिया है .और हाँ ब्लॉग के लिए कम से कम 1 घंटा जरूर दूंगा . आलस्य और   इंटरनेट के गलत इफेक्टो के कारन ब्लॉग से दूर होता चला उस ब्लॉग से जिसको मैंने बनाया और उस ब्लॉग ने मुझे पहचान दिलाई

एक नई पहचान जो मेरे भूत काल से बिलकुल अलग थी . जिस समय मैं अनजाने में ब्लॉग पर आया था उस समय मैं खानाबदोशो जैसा जीवन व्यतीत कर रहा था लेकिन आज एक कम्पनी को सही ढंग से चला रहा हूँ .वह भी कार बेचने वाली कम्पनी .

खैर आज से पुरानी बातो को भूलते हुए एक बार फिर से नई शुरुआत आपके आशीर्वाद के साथ चालू होचुकी है



बुधवार, अगस्त 15, 2012

आजादी में गिरफ्तार हम ....हमारा कसूर क्या

आजादी के दिन हमारा शहर कर्फ्यू ग्रस्त हालत में जश्न ? मना रहा है . लगभग महीना भर होने को आ रहा है हमारे शहर की फिजा खराब हुए .सडको पर सन्नाटा है दिलो में खौफ है .

हम जैसे लोग तो कर्फ्यू को कई महीनो तक झेलने का माद्दा रखते है . लेकिन रोज़ कुआँ खोदने वाले लोगो के दुखो की कल्पना से ही मेरा तो मन विचलित हो ही जाता है .दिहाड़ी मजदूरों के परिवारों के हालत तो बदतर हो गए होंगे उन बेचारो को तो नमक भी रोज़ ही खरीदना पड़ता है . खैर हमारे हुक्मरानों को इससे कोई फर्क तो पड़ता नहीं वह तो 2014 की गुणा भाग लगा रहे होंगे इसका फायदा कैसे उठाया जाए .

दुःख तो होता है आज की मीडिया को देख कर .किसी भी चैनल किसी भी अखबार में   कोई भी खबर हमारे बरेली की नहीं जबकि दो साल में तीसरी बार दंगे हुए और कर्फ्यू लगा . तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया को चिंता है हाई फाई सोसाईटी  औरतो की मौत मर ,उन्हें चिंता है मीडिया द्वारा प्रायोजित आन्दोलनों की कवरेज पर . और न जाने कितने जरूरी काम है सिवाय देश के शन्ति प्रिय इलाको में हो रही हिंसा के

मुंबई में हिंसा हुई सिर्फ वही  चैनल रो रहे  है जिन्हें नुक्सान हुआ . बाकी सब खामोश . आसाम की आग धर्म आधारित कर दी गई जबकि  लड़ाई घुसपैठियो के खिलाफ है . खैर हम भी ओरो पर क्यों रोये अभी अपने ही दर्द बहुत है हमें रुलाने को .

अगर अब जल्दी हमारी समस्या का कोई  समाधान नहीं हुआ तो कई शहर बरेली बन जायेंगे . हो सके तो कोई हमारी आवाज़ मे  अपनी आवाज मिला दे 

शुक्रवार, जुलाई 27, 2012

हमें बचाओ .... हम जल रहे है

बहुत दिनों बाद दरबार लगाया है . कई दिनों से यह वायरस से पीड़ित  था . आज देखा तो ब्लॉग की  तबियत ठीक लग रही थी . इसलिए कुछ जुगाली कर ही ली जाए . कई विषय सामने से गुजर गए जिस पर लिखना चाहता था लेकिन ..... खैर देर आयद तो दुरुस्त आयद

सब से ज्वलंत विषय है मेरे शहर बरेली में पिछले 6 दिनों से चलने वाला कर्फ्यू .. हिन्दू मुस्लिम दंगे के बाद तीन चार मौतों के बाद आगजनी हुयी और अंजाम हुआ की कर्फ्यू ... कावारियां निशाना बने और फिर राजनीति ने आग में घी डाला .जब घी पड़ा है तो आग भडकेगी ही . और वही हुआ दो साल में दूसरी बार दंगे हुए  हम बरेली वाले जो अमन पसंद का तमगा लगाए घूमते थे आज अलीगढ ,मुरादाबाद ,मेरठ से भी ज्यादा बदनाम हो गए .

यह बार बार के दंगे हम को बर्बाद तो कर ही देंगे .एक विचार आता है यह दंगे आम क्यों होते जा  रहे है ? बहुत सोचने के बाद मुझे तो यह लगता है दंगाईयो पर कठोर कार्यवाही न होना एक कारण है . डर तो किसी का नहीं है दंगाइयो को इसलिए बार बार वह अपने नापाक इरादों पर कामयाब हो जाते है और हमारे शासक वोटो के नुक्सान के डर से खामोश रहते है . चाहे वह कोई हो .... यह वादी या वह वादी

हमारे लिए तो रोजमर्रा की बात हो गई है जैसे वियतनाम ,ईराक और अफगानिस्तान हो यह ......

सबसे मज़े की बात यह है हमारा दर्द बस हमारा होकर रह गया है .प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया को मूर्ति की चिंता है ,अन्ना के सर्कस में भीड़ ना आने की चिंता है ,तिवारी के डी एन ऐ की चिंता है ............ लेकिन एक शहर में लगी आग की चिंता नहीं जिसमे जल रहा है हमारा सदभाव


मंगलवार, मई 15, 2012

सांसद रेखा के बहाने

सांसद  रेखा के बहाने आज का पुराना सच्चा किस्सा याद आ गया . लोकतंत्र  भी कितना अजीब है हमारे यहाँ के सांसद इंदिरा  लहर में जीत कर दिल्ली गए . जब उनसे उनके क्षेत्र  में लोगो ने उनसे पूछा आपको संसद में सबसे अच्छा कब लगा .तो वह यादो में खो गए और साफ़ गोई से बोले .........एक दिन जब फिल्म गंगा जमुना आई थी तब हम उसका टिकिट लेते समय भीड़ में अपना कुर्ता तक नुचवा चुके थे क्योकि हमें वैजयन्ती माला को परदे पर देखना था . और अब वही  बैजयंती माला संसद में हमारे पास में बैठती है . इससे अच्छा क्या लगेगा हमें .

वही  संतोष आज मुझे तमाम सांसदों के चेहरे पर लगा जब रेखा शपथ ले रही थी . ना जाने कितने सांसद सलामे इश्क को याद कर रहे  होंगे .कितने सांसदों ने अपने उन दिनों में रेखा को सपने में जरूर महसूस किया होगा वही वजह थी मेज की थपथपाहट  ज्यादा जोर से थी . जय हो रेखा की .वह अपने अनुभवों को महसूस जरूर कराएंगी चाहे वह उत्सव का हो या टेल  ऑफ़ कामसूत्र का .........

शुक्रवार, अप्रैल 20, 2012

कैसी कही

उन्हें शिकवा है  हम उन्हें न समझ सके 
अगर यह हम कहते  तो बेहतर होता 
बहुत कुछ न कह  सके हम उनके लिए 
शायद कुछ कहते तो अच्छा होता

जो दिल में है कमबख्त वही दिखता है 
अच्छा होता हमारे चेहरे पर चेहरा होता 
हम भी उनमे शुमार हो जाते धीरू
जिन्हें शराफत का तमगा मिलता