शुक्रवार, अक्तूबर 03, 2008

अरे तुम तो मुझ से बड़े पागल लगते हो

एक पगलिया जो एक पहली सी लगती थी
सारे शहर में पत्थर लिए फिरती थी
न जाने कब वह बिगड़ जाती थी
हाथ में पत्थर लेकर लोगो को दौड़ती थी
भयभीत जनता सहम जाती थी
उसे देखते ही सडके खाली हो जाती थी
एक दिन हमारी किस्मत खराब थी
वह सड़क पर हमारे साथ थी
उसका रौद्र न्रत्य चालू था
उसका हाथ का पत्थर डरा रहा था
चोट न लग जाये लोगो को भगा रहा था
हमें अपनी मर्दांगनी का जोश चढ़ गया
हमने भी एक पत्थर हाथ में उठा लिया
वह यह देखकर जोर से हसीं
बोली यह क्या करते हो
अरे तुम तो मुझ से भी बड़े पागल लगते हो

1 टिप्पणी:

  1. वह यह देखकर जोर से हसीं
    बोली यह क्या करते हो
    अरे तुम तो मुझ से भी बड़े पागल लगते हो

    'poetry with very emotional touch'

    regards

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा