शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

इस सदी के दूसरे दशक का पहला साल मुबारक हो .

इस सदी के दूसरे दशक का पहला साल मुबारक हो .
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कल भी वही सूरज उगेगा  
कल भी वही दिन निकलेगा 
नही होगा तो सिर्फ कलेंडर 
जो आज दीवार पर लगा है 
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एक नया साल उम्मीदे जगाता है 
एक नया साल सपने  दिखाता है 
और वह  पैदा करता है आशाये 
जो जीने की राह आसान बनाता है 
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बुधवार, दिसंबर 29, 2010

धन्यवाद २०१० बहुत बहुत धन्यवाद

धन्यवाद २०१०  बहुत बहुत धन्यवाद . जो व्यक्तिगत मुझे दिया उसके लिए तो धन्यवाद शब्द छोटा पड़  ही  जाएगा . इस २०१० ने मुझे आदमी काम का बना दिया वरना निकम्मों में शुमारी थी मेरी . यहाँ तक एक बार मेरी बेटी ने भी मुझ से पूछा पापा आप करते क्या हो ?  इस साल ने मुझे इस सवाल का जबाब दे ही दिया .


खैर सब कुछ सही बीता है अब तक . लाखो करोड़ के घोटाले हुए हमें कोई फर्क नही पड़ा .एक बिल्डिंग ३० मंजिल ज्यादा बन गई हमें कोई फर्क नही पडा . रामजन्म भूमि का फैसला हुआ हमें कोई फर्क नही पड़ा .सचिन ने डबल सेंचुरी बनाई फर्क नही पडा . किसी का ब्यान आया कश्मीर भारत का हिस्सा कभी ना रहा हमें कोई फर्क नही पडा . राहुल गांधी ने हिंदुत्व आतंकवाद को लश्करे तैयबा से ज्यादा खतरनाक बताने से हमें फर्क नही पडा .ना जाने कितनी और गतिविधिया हुई जिसका फर्क हम पर नही पडा . 


फर्क तो पडा ओबामा का नाच देखकर . फर्क पडा सरकोजी को कार्ला ब्रूनी की उंगली पकडे देखते हुए . फर्क पडा अम्बानी की अट्टालिका देखकर . फर्क पडा शीला की जवानी और मुन्नी बदनाम देखकर . फर्क पडा विकीलीक्स के लीक देखकर


वैसे २०१० कुल मिला कर तुम बहुत अच्छे हो तुम्हारी यादे हमेशा ज़िंदा रहेगी .  जाते हुए आता २०११ मिले तो उससे कहना गनीमत रखना हमपर .
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और एक बात २०१० तुम ब्लागवाणी अपने साथ ले गए . ब्लागरो को खेमे में बाट गए .खैर जब वह दिन ना रहे तो यह भी नही रहेंगे .
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शनिवार, दिसंबर 25, 2010

अटल जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाये

 



आज  श्री अटल बिहारी बाजपेई का जन्मदिन है . एक लोकप्रिय राजनेता प्रख्यात कवि असाधारण व्यक्तित्व और सरल स्वहाव के धनी  अटल जी को जन्मदिन की ढेरो शुभकामनाये .

मुझे याद आता है उनका सहज व्यक्तित्व जब वह नेता विरोधीदल थे और मेरे पिता भाजपा के संसदीय दल के सचेतक थे . जब अटल जी को संसद में कभी किसी कारण वश ना होना होता था तो वह खुद फोन से सूचित कर देते थे .

अटल जी देश की धरोहर है . मै उनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं .

शनिवार, दिसंबर 11, 2010

शादी का सोलहवा साल- पो पो की झईम झईम

कहा जाता है मैं जब बहुत छोटा था तब बैंड बाजे की आवाज सुनकर रोने लगता था . घर के सामने से निकलती बारात मुझे चीखने को मजबूर कर देती थी . क्यों ......... इसका पता सब को तब  चला जब मैं बोलने लगा . उस समय भी बारात की आवाज़ पर मेरी रुलाई फूट पड़ती थी . मुझे लगता था सब की शादी हो जायेगी मैं ही अकेला रह जाउंगा .यह ही पीड़ा  मुझे बारात से दूर रखती थी . और बैंड की आवाज़ मुझे रोने पर मजबूर कर देती थी .

वन टाइम प्रोग्राम था मेरा शादी कैसे भी किसी से भी . यह बात तब की है जब मैं दूसरे या तीसरी में पढता था . समय के साथ साथ यह सब धूमिल होता गया . लेकिन बज़ता हुआ बैंड जब तब मुझे याद दिलाता था सब की शादी हो जाएगी और मैं रह जाउंगा कुंवारा  .............

खैर समय बीतते देर क्या लगती है अगर शारदा क़ानून आड़े नही आता तो कब की पो पो की झईम झईम हो चुकी होती . २१ साल की उलटी गिनती चालू हो गई . रिश्ते आने लगे जहा ठीकरा फूटना होता है वही फूटता है . और वही हुआ . सब कुछ तय हुआ . १२ दिसंबर ९४ को आखिर बारात जानी थी . लेकिन समय की करवट देखिये सब कुछ था लेकिन बैंड नही था . क्यों ..... शायद किस्मत में ही नही था कि बैंड बजे

जिस होटल  में बारात ठहरी थी  उसके पास की मार्केट शाम से ही बंद करा दी गई जबरदस्ती .मेरे दोस्त जब बाहर घूमने गए तो एक दुकानदार से जब दुकाने बंद का कारण पूछा तो उसका जबाब में हम लोगो के बारे में उसके सदविचार सन्न करने वाले थे . कीमत तो कही चुकानी ही पड़ती है .

सब कुछ शान्ति  से बीत गया . पहले भी मैं बैंड बाजे की आवाज़ सुनकर रोता था और आज भी .........:-) आज भी इसलिए कि मैं कुंवारा क्यों नही रहा





स्केनर ने धोखा दिया जुगाड से फ़ोटो लगाये है कैमरे से खीच कर 

शुक्रवार, दिसंबर 10, 2010

नोबेल अगर किसी कश्मीरी आतंकवादी को मानवाधिकार के नाम पर मिलेगा तो हम क्या करेंगे ?

हम नोबेल  पुरूस्कार को इतना महत्त्व क्यों देते है . दुनिया को तबाह करने वाले डायनामाइट की खोज करने वाले अल्फ़्रेड नोबेल  ने अपने धन से इन पुरुस्कारों की शुरुआत की . हमेशा से विवादों में रहने वाले यह पुरूस्कार समिति  ने महात्मा गांधी को इस लायक नही समझा कि उन्हें नोबेल  पुरूस्कार दिया जाए . महात्मा गांधी को अगर पुरूस्कार मिल जाता तो यह नोबेल  का ही सम्मान होता . 


खैर यह बात तो पुरानी है अभी साल भर पहले बराक ओबामा को शान्ति का नोबेल  दे दिया वजह सिर्फ एक वह अमेरिकन राष्ट्रपति है . मैं तो नोबेल  पुरूस्कार से इतेफाक नही रखता . इस साल चीन के  लिउ जियाओबो  को यह पुरूस्कार दिया गया है . कहा जा रहा है यह चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता  है और इस समय जेल में ११ साल की सज़ा काट रहे है . चीन इसका विरोध कर रहा है उसके समर्थन में कई देशो ने इस समारोह  का  वहिष्कार किया है . 


चीन जो एक आर्थिक शक्ति है में मानवाधिकार हनन यह चीन का अंदरुनी मामला है . हम बाहर खड़े लोग यह नही कह सकते कौन सही है या कौन गलत . अधिकतर लोग चीन की बुराई कर रहे है . इस मुद्दे पर मैं चीन के साथ हूँ . यह सही है चीन हमारा दुश्मन देश है यह हमारे लिए सबसे बड़ा खतरा है . लेकिन इस वजह से हम चीन का विरोध करे तो यह  सही नही . 


मुझे डर है कि कल को किसी कश्मीर अलगाववादी या कहें आतंकवादी को नोबेल  मिलेगा वह भी शान्ति का . उसे भी मानवाधिकार कार्यकर्ता कहा जाएगा तो हम क्या करेंगे  उस समय . हम तो इतने सक्षम भी नही कि हमारे कहें से दो देश भी वहिष्कार करे . 


इसलिए इस विषय पर भी सोचना चाहिए . और मेरा मन कहता है साल दो साल में किसी कश्मीर अलगाववादी को इस पुरूस्कार से नवाज़ा जरूर जाएगा . 

सोमवार, दिसंबर 06, 2010

६ दिसंबर ९२ कुछ ख़ास था मेरे लिए

गुरु की खोज जारी है या कहें लगभग तय है . दो चार दिन में गुरु जी घोषित हो ही जायेंगे .

आज ६ दिसंबर है . ६ दिसंबर ९२ कुछ ख़ास था मेरे लिए . ख़ास क्यों ........ ख़ास इसलिए उस दिन मेरे मित्र मंडली में से पहले मित्र की शादी तय हो रही थी और ६ दिसंबर को गोद भराई जिसे रिंग सरेमनी भी कह सकते है थी . दोस्तों में से कोई पहली बार एक दुल्हा बनने की और अग्रसर था . यादे गुदगुदा रही थी कल तक हम साथ साथ खेले ,घुमे और आज अचानक एक साथ बड़े हो गए . शादी की वेटिंग तक पहुच  गए थे हम लोग .

हमारी मंडली के बारे में कहा जाता था जिस नक्षत्र में इनकी शादी होगी वह भी भुलाया नही जाएगा . खैर हम लोग तैयारी में थे .सूट बूट पहन कर जेंटल मैन बन गए थे . लड़की वालो के यहाँ जाना था . तभी अयोध्या के बारे में खबरे आने लगी . सामान्य सी स्थति समझी और हम लोग सब पहुच ही गए . इधर  हमारा दोस्त दुल्हा बनने की राह में था उधर अयोध्या में इतिहास अपने को दोहरा रहा था . माहौल  में अजीब सी बैचेनी थी .पंडित जी में तेज़ी थी . और मेहमानों में भी सब जल्दी में लग रहे थे .

तभी अखवारो के एडिशन बिकने लगे . पहला एडिशन जब आया उसमे था कार सेवक् ढाचे पर चड़े . उस समय मेरा दोस्त अपनी होने वाली साथी के साथ खडा ही हुआ था . थोड़ी देर बाद जब वह अंगूठी पहना रहा था उसी समय खबर आयी एक गुम्बद गिरा दिया गया है . जब उसकी बीबी [होने वाली ] ने अंगूठी पहनाई उसी समय खबर मिल गई है दूसरा गुम्बद भी गिर गया है . अब मेहमानों के सब्र का बाँध टूट गया था वह खाने का इंतज़ार करने के बजाय अपने घर पहुचने की जुगाड़ में थे . जब तक सब कार्यक्रम सम्पन्न हुआ तब तक अयोध्या में भी सब काम ख़तम हो गया था . अधिकाँश मेहमान अपने घरो को लौट चुके थे .

और सडको पर सायरन बजने शुरू हो गए थे और सबको घर जाने की ताकीत मिल रही थी . सब खाना ढोंगे में रखा इंतज़ार कर रहा था कि आओ हमें खाओ . लेकिन खाने वाले अपनी भूख खो चुके थे . हम कुछ दोस्तों ने खाने का मान रखा . और दोस्त को उसके घर पहुचा कर अपने घर पहुचे .

इस लिए बहुत यादगार है ६ दिसंबर मेरे लिए .

शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

आवश्यकता है एक ब्लाग गुरु की ..........................

                                   आवश्यकता है  
              एक गुरु की जो ब्लॉग पर सफल होने के गुर सिखा सके. 


                               योग्यता - कम से कम एक ब्लॉग का तन्हा मालिक हो .
                               अनुभव -  कम से कम २ ब्लागर के गुरु रह चुके हो .
                               वेतन -     योग्यतानुसार
                               संपर्क -     दरबार .ब्लागस्पाट .कॉम
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सोचता हूँ एक ऐसा विज्ञापन छाप दूँ . क्योकि पढ़ा है बिना गुरु के वह हासिल नही होता जो चाहिए . अभी तक कोई गुरु नही बना पाया मैं . मेरी बदकिस्मती है . ब्लॉग भी तो एक सागर है इसमें तैरते रहने के लिए एक प्रशिक्षित व्यक्ति की मदद की जरुरत है .  आखिर कब तक हाथ पैर मारे . मेरी भी इच्छा है मैं किसी को प्यार से गुरुदेव पुकारू . और एक बात और आजतक जो मेरे गुरु रहे है वह बहुत ऊंचे पदों पर पहुचे है . उनमे से दो को राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है . और एक गुरु आज बहुत बड़े प्रदेश के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष है .

अगर आपको ऐसे गुरु की जानकारी हो तो कृपया मुझे अवश्य दे .

मंगलवार, नवंबर 30, 2010

बचपन की यादे - वह लहडू का सफ़र

 मय का आभाव है बच्चे बारह महीने पढ़ते है ट्यूशन और कोचिंग हमेशा चालू रहती है इसलिए लम्बी छुट्टियों में भी घर पर ही रहकर कम्टीशन की तैयारी में जुटे रहते है बच्चे माँ बाप सहित . 

एक ज़माना हमारा था . स्कूल की छुट्टी का मतलब होता था पढ़ाई से छुट्टी . गर्मियों की छुट्टी में जब दो महीने स्कूल बंद रहते थे उस समय शायद ही कोई बच्चा अपने घर में रहता था सब नानी  के घर जरूर जाते थे . मैं तो जाता ही था . वह दिन आज याद  आ रहे है . 

मेरी ननिहाल शहर से लगभग ४० किमी दूर थी २० किमी तक सड़क थी उसके बाद लहड़ू (बैलगाड़ी ) से जाना पड़ता था . लहड़ू से लगभग चार पांच घंटे लगते थे अगर लगातार  चले . इसलिए हम शाम को शहर से कसबे में आ जाते थे वही से सुबह जल्दी निकालते थे खराबा खराबा . आखिर जमींदार परिवार के नवासे थे तो लाव लश्कर भी साथ होता था . मुझे याद है एक लहड़ू आता था और एक लहडिया . लहड़ू को आप कार मान ले और लहडिया को जीप . लहडिया में सामान होता था और नौकर . और हम लोगो को सज़ा हुआ लहड़ू जिस में शानदार और जानदार बैल जुते होते थे .लहड़ू ऊपर से चादर से ढका होता था अन्दर गद्दे विछे होते थे . एक कोचवान होता था जो बैलो को हाकता था . 

लहडिया हमसे पहले चल देती थी और बीच रास्ते में एक बाग़ में पड़ाव डालती थी .चाकर वहा पर साफ़ सफाई करके फर्शी विछा कर पानी भर कर हमारा इंतज़ार करते थे हम लोग लहड़ू से वहा पहुचते थे तब तक सब रेड्डी मिलता था . हम वहा दोपहरा करते थे . यानी दोपहर में आराम . किस्से कहानिया होती थी . खेल कूद भी . उस समय पर्दा प्रथा जोरो पर थी लेकिन मेरी माँ लहड़ू पर से ऊपर डाली चादर हटवा देती थी लेकिन गाँव नज़दीक आने पर फिर से चादर डाल दी जाती थी . 

शाम तक हम अपनी नानिहाल पहुचते थे वहा भी स्वागत का इंतजाम होता था . नानाजी के राज में बच्चे तो शेर हो ही जाते है . वही हाल हमारा था . ५ पैसे की २५ लेमनचूस खाते थे . जो फरमाइश करते पूरी होती उस समय गाँव में . खेल कूद ,गुलेल ,गेंद तड़ी , सपोलिया , खो खो ,कबड्डी , बालीबाल और तो और उस जमाने में गाँव में बड़े जमींदार लोग टेनिस खेलते थे हैट लगाकर . मनोरंजन के लिए किस्से कहानिया . हमारे यहाँ एक नौकर था उसे किस्से बहुत आते थे जब मन होता था उसे बुला लेते थे . यहाँ तक रात में भी . वह किस्से सुनाता रहता था और हम लोग सो जाते थे . वह भी आधी रात तक बैठा बोलता रहता था उस डर  रहता था अगर यह लोग जग रहे हो और मैं चुप हो गया तो मार की संभावना बड़ जायेगी .

उसके किस्से और गाँव की मस्तिया फिर कभी 

शनिवार, नवंबर 27, 2010

वाह री किस्मत .........

मेरी भी जिन्दगी भी क्या जिन्दगी है जब आराम किया तब आराम किया सारे रिकार्ड तोड़ दिये आराम करने में .पहले मेरी दिन चर्या थी सुबह सो कर उठना नित्यक्रिया से निवृत होकर अखबार पढ़ना उसके बाद नाश्ता फिर इंटरनेट ............ ब्लॉग शलाग तब तक लंच तैयार उससे पहले स्नान फिर भोजन उसके बाद दोपहर में आराम ................. शाम को सो कर उठना फिर टीवी ,इंटरनेट कोई आ गया तो उससे मिललिए फिर डिनर उसकेबाद फिर इंटरनेट और फिर सोना . कितनी मेहनत करनी पड़ती थी आराम करने पर . कुछ लोग जो शुभ चिन्तक थे हलके से कुछ  कहते थे तो मैं कहता था जब भगवान् सुबह उठाने से पहले मेरे तकिये के नीचे ५००० रु . रख देता है तो मुझे काम करने की क्या जरुरत .........पर फिर किसी की नज़र लग गई मुझे .

समय ने मेरे साथ एक खेला बात बात में एक व्यापार की बात हुई घर के सब लोग इस बात पर राजी थे अगर मैं खुद यह काम देखू  तो ही काम करा जाएगा . मेरा  समय खराब था मैंने हां कर दी  . और वही बात मेरे गले पड़  गई आज मेरी हालत कोल्हू के बैल की तरह हो गई है आज स्थति यह है . सुबह जल्दी उठना चाय पीते हुए सरसरी तौर पर अखवार पढ़ना ८ बजे से पहले नहाना फिर नाश्ता या कहें खाना खा कर ५० किमी कार चला कर साइड पर पहुचना . दिन भर वहा खपे रहना शाम को ५ -६ बजे चल कर एक घंटे की ड्राइव कर फिर घर पर वापिस आना . तब तक इतनी शक्ति नही बचती कुछ करा जाए . रात में जल्दी खाना खा कर . मेल चेक करना दो चार पोस्ट पढ़ना और लिखने का मन होने के वावजूद पोस्ट ना लिख पाना .

 यह मेरी हालत हो गई . मैंने तो कुल्हाड़ी पर पैर मारा है या कहें एक षड्यंत्र का शिकार हो गया मैं . इसी बीच मेरे पैर में चोट लग गई . मेरे डाक्टर ने तीन हफ्ते का बेड रेस्ट बताया लेकिन समय ना मिलने के कारण एक दिन का भी रेस्ट ना मिल सका . आज भी स्टिक लेकर रोज़ चाकरी बजा रहा हूँ .

वाह री किस्मत .........

बुधवार, नवंबर 17, 2010

अफ़सोस बेहद अफ़सोस कुछ लाख करोड़ रुपल्ली के लिए एक नेता से इस्तीफा ले लिया

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अफ़सोस बेहद अफ़सोस कुछ  लाख करोड़ रुपल्ली के लिए एक  नेता से इस्तीफा ले लिया गया . क्या होता अगर वह करोडो रूपए मिल भी जाते सरकार को . उससे से क्या कोई भ्रष्ट्राचार  ख़तम हो जाता या कोई कमी आ जाती .देश की जनता को गुमराह कर रहा विपक्ष सरकार को काम नहीं करने दे रहा है . अगर एक करोड़ सत्तासी लाख रुपए 2 जी स्पेक्ट्रम से मिल ही जाते तो सबसे ज्यादा जनता का ही होता . जो आज इतने सस्ते में बात हो रही मोबाइल से वह क्या हो पाती ? कभी नहीं . बिलकुल नहीं ........... विपक्ष नहीं चाहता कि आम जनता सस्ते में बात करे अपनों से और दुःख दर्द दूर करे . 

रुपए पैसे के मामले में सब एक हो जाते है संसद में . जो एक दूसरे को गाली देते है वह भी . मांग है जेपीसी की . क्या होगा जांच होके और क्या हो गया आज तक रिपोर्ट आकर . जितना समय ,पैसा ,कागज़ इन रिपोर्टो को बनाने में खर्च होता है उससे कई लाख बच्चो की कापी किताब आ सकती है . 

लेकिन संसद में विपक्ष कभी इकठ्ठा होकर कश्मीर में हो रहे आतंकवाद के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाता . कभी नक्सलवाद के प्रश्न पर एक नहीं होता . भूख और महंगाई पर कमेटी नहीं बनाता . क्यों ................ शायद इसमे वोट पर फर्क नहीं पड़ता और नोट ना ही मिलता .

और भारत का सत्ता पक्ष उसे तो ब्रह्मा से वरदान मिला है शायद ........ कुछ भी करो  तुम्हारे विरोधी कभी तुम्हे घेर नही पायेंगे और तुम अजेय रहोगे .

और ब्रह्मा के वरदान को सही साबित करने के लिए जनता जनार्दन हमेशा (एक दो बार अपवाद स्वरूप ) वचन निभा रही है 

शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

बचपन की यादे जो मै सज़ोये हुये हूँ -१

बचपन की तरफ जब मुड़कर देखता हूँ तो जीवन के नवरस याद आ जाते है . बम्बई ........ जी हां उस समय बम्बई ही थी वह .सपरिवार घूम रहा था तो एक जगह मचल  गया कैमरे के लिए सड़क पर लोट गया बच्चा जिद पर था पापा के आगे धर्मसंकट था सामने  ही दूकान थी . Agfa 4 नाम का एक कैमरा खरीदा  तकरीवन १५० रु. कीमत थी . उसी कैमरे से बम्बई ,पूना ,कोल्हापुर ,गोवा तक की तस्वीर उतारी . क्लास ५ में पढ़ता था मैं उस समय .

समय के साथ साथ उमर बढती  गई और मांगे भी . कक्षा ६ स्कूल साइकिल से जाना चाहता था और लड़को की तरह .लेकिन घरवाले राज़ी नहीं किसी भी कीमत पर . जीप से भेजा जाता था ड्राइवर जाता था छोडने . बहुत बुरा लगता था . एक तरीके से बहिष्कृत था मैं साथ वाले लड़को के लिए सब अजीब से देखते थे . फिर जिद की. एक कमेटी बनी घर पर साइकिल के लिए .तमाम मुश्किल प्रस्ताव मेरे पक्ष में पास हुआ . मैं तार ब्रेक वाली साइकिल जो B.S.A. S.L.R. थी चाहता था लेकिन कहा गया गिर जाओगे कमेटी ने hero jet पसंद की वह भी लेडीज साइकिल . मन मार कर तीन साल तक वह साइकिल चलाई . बहुत दिनों तक वह ड्राइवर मेरे पीछे साइकिल चलता  था . बहुत गुस्सा आता था . लेकिन ...............

कक्षा ९ मैं मोटरसाइकिल की तलब लगी स्कूटर पर राजी हुए लेकिन मोपेड तक नहीं मिली . या तो कार से चलो या साइकिल से बीच  की कोई भरती नहीं थी मेरे लिए . साइकिल ऐसे चिपकी जो स्नातक तक नहीं छूटी . बहुत मन था बुलेट मोटरसाइकिल का जो अब हार्ले डेविडसन पर अटका है कभी  पूरा  नहीं हुआ .पता नहीं क्यों आज तक घर वालो ने मोटर साइकिल नहीं दिलाई .

बचपन की यादे किश्तों में सुनाने की इरादा है . अब अकेले में वही यादे सामने उठ खड़ी होती है . यह एक प्रयास है मेरा .देखिये कहाँ तक सफल हो पाता हूँ .

शनिवार, नवंबर 06, 2010

स्वागत पाताल के राजा और उनके कुत्तो का भी

थोड़ी देर बाद पाताल लोक का राजा जो अब व्यापारी बन गया है अपने देश के मुंबई नगर में पधार रहा है . कल ही तो राम जी रावण को मार कर अयोध्या लौटे थे वह उत्सव पूरा नहीं हुआ कि अहिरावण आ पहुंचें . सभी समाचार चैनल पलक पावडे विछाये खैरमकदम कर रहे है . रिपोर्ट चल रही है कितने हवाईजहाज ,कारे ,हैलीकाप्टर और कुत्ते साथ आ रहे है .

कुत्ते वह भी उन  के साथ वह भी चालीस कमाल है . आज उन कुत्तो के बारे में चर्चा की जाए जो बेहतर रहेगा . कुत्ते मूलतः वफादार माने जाते है जब तक वह राजनीति में ना उतरे . और इसमे शक है राजनितिज्ञो की संगत में रहने वाले कुत्ते क्यों नहीं राजनीति में उतरेंगे . इसी सुपर काम्प्लेक्स के साथ अमरीकी कुत्ते आज मुंबई में जहा तहा गर्व से सर उठाये घूम रहे है और मुंबई के कुत्ते आदर्श को देखते हुए आज खामोश है . और दिल्ली के इस बात को लेकर खुश है कि एक दिन बाद उन से मुलाक़ात होगी .

यहाँ के कुत्ते और वहां के कुत्ते बहुत से समस्याओं पर चर्चा करेंगे कुछ  संधि करेंगे जो आगे की नस्लों के काम आयेगी . भारतीय कुत्ते इस बात को लेकर चिंतित है उनके अपने देश में उनकी कोई कदर नहीं है विदेशियों को ज्यादा मान दिया जाता है .अमेरिकी कुत्तो में यह बात नहीं है वह अपने देश में अपने ही कुत्तो को श्रेष्ट मानते है . अपने यहाँ के कुत्ते आज भी झूटन पर गुजर करते है लेकिन वहां के फ्रेश फ़ूड काही इस्तेमाल करते है . इसी तरह के विषयो पर एक समांतर सेमीनार मुंबई के ताज और दिल्ली के मौर्या में होगी  . 

सम्मलेन की ताज़ा जानकारी आपको किसी तेज़ या धीमे चैनल पर कोई दीपक या बरखा देते हुए नज़र आ जायेंगे . अब मैं इस कुत्ता पुराण से विदा लेता हूँ . 

नोट ;- यह निर्मल हास्य के तौर पर भी लिया जा सकता है 

गुरुवार, नवंबर 04, 2010

जलाओ दिये रहे ध्यान इतना - धरा पर अन्धेरा कही ना रह जाए


                 जलाओ दिये रहे ध्यान इतना 

              धरा पर अन्धेरा कही ना रह जाए  



                                                    
         दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओ सहित


कम से कम 
अपने पड़ोस का तो कोई घर 
अँधेरे में ना रहे 
कोई दीपावली पर 
भूखा ना रहे .  

किसी के रूआसे चेहरे पर मुस्कान आ जाए 
आओ ऐसी दिवाली इस बार मनाये . 



शनिवार, अक्तूबर 30, 2010

I miss you , Paa { एक बेटी की पोईम पापा के लिये }

बच्चे जब बड़े होने लगते है तो एक अजीब सी खुशी का अनुभव होता है . आज मेरी बेटी हास्टल से घर आयी है कई महीने बाद उसने एक पोइम मेरे लिए लिखी है . अभी वह 8th क्लास में है . मेरा तो अंगरेजी ज्ञान बहुत सीमित है . आप ही निर्धारित करे उसने कैसा लिखा . [ यह पोइम उसने मेरे जन्मदिन पर अपने होस्टल में लिखी है ]

     I miss you , Paa  

 Why did you have to go Paa
  Why did you have to go Paa
  Why did you have me behind    
  With nothing to do but cry 
                                                             
  I miss you terribly ,paa 
  I can't believe that your's far 
  I can't believe this had happened 
  I don't know life will go on 

  These times we had together 
  Keep coming back to me 
  Those shopping place,eat outs
  And all the movies we want to see 

  I miss all the talk and walk
 And splendid love you showed 
 The guidance you gave 
 And all my sorrows you took 

  The marvelous power of understanding 
  And great enthusiasm towards yours girl
  I remember how proud you were 
  And i'll be always daddy's girl      
                                                                                                     
                                         - AKSHITA-                                                             
                                                                 

शुक्रवार, अक्तूबर 29, 2010

काश आज भारत में तीसरी श्रेणी का रेलवे कोच होता तो राहुल गांधी अब तक महात्मा गांधी बन चुके होते

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काश आज भारत में तीसरी श्रेणी का रेलवे कोच होता तो राहुल गांधी अब तक महात्मा गांधी बन चुके होते . सामान्य श्रेणी में राहुल की मुंबई यात्रा धन्य कर गई . आज़ादी के साठ साल के बाद अब कांग्रेस का नाहर यह खोजने  निकला है गरीब रोटी के लिए परदेस क्यों जाता है . क्या कारण है ? 


कारण साफ़ है हमको पता है सबको पता है .क्या  कोई ऐसा नहीं  जो राज कुमार को बता दे कि वह नंगा है ............. 



सोमवार, अक्तूबर 25, 2010

एक बार फिर आपकी जरुरत आन पडी

बहुत दिनों से व्यस्त था गाहे वगाहे ब्लॉग पर आता था पढ़ता था और चला जाता था . एक व्यक्ति को कई भूमिका निभानी पड़ती है तो समय का अकाल तो पड़ता ही है . अभी हमारे यहाँ पंचायत का चुनाव चल रहा था . हमारे बहुत से साथी चुनाव का सामना कर रहे है कई दिन उनके प्रचार में लगा रहा .उधर घर की जिम्मेदारी भी है और एक नया व्यापार भी समय ले रहा है उसका निर्माण भी चल रहा है वारिश और बाढ़  की वजह से हम पिछड़ गए है दीपावली का सुनहरा सीजन हाथ से निकल ही गया है .

इसी कशमश में आराम की सोच ही रहा था अचानक आज सुबह घर में ही फिसल गया . घुटने में काफी चोट आई है एक्स रे में पता चला लिंग्मेंट डैमेज हो गया है यह मुझे डाक्टर ने बताया .मुझे नहीं मालूम यह क्या है . लेकिन बहुत दर्द है असहनीय ...... प्लास्टर की जगह आजकल चलने वाले बेल्ट कस दिए है तीन हफ्ते के लिए . डाक्टर का तो कहना है पूरा  आराम करो नहीं तो आपरेशन की नौबत आ सकती है . खैर मुझे दर्द से ज्यादा चिंता अपने पेंडिग कामो की है . अगले दो दिन तक तो मैं आराम को तबज्जो नहीं दे सकता . जो होगा देखा जाएगा .

ब्लॉग पर आने के बाद मैंने अपना हर सुख दुःख यहाँ पर शेयर किया है . उसी कड़ी में एक नया दुःख लिख रहा हूँ . आपकी सदभावनाए एक टानिक का काम करती है . या कहें बिना साइड इफेक्ट की पेन किलर होती है .

शुक्रवार, अक्तूबर 15, 2010

आज मेरे पापा जी का जन्मदिन है .

आज मेरे पापा जी का जन्मदिन है . मेरे पापा जी ने अपने परिश्रम से उन उचाईयों को छुआ है जो हरेक के लिए आसान नहीं . अपने पिता के बारे में  लिखना बहुत कठिन है लेकिन उनके बारे में लिखूंगा जरूर . कुछ पुरानी यादे ताज़ा कर रहा हूँ .



परिश्रम और  संघर्ष  से आज यहाँ तक पहुचे आज मेरे पापा जी एक विश्राम मयी जीवन व्यतीत कर रहे है . आज जो हम है उन्ही की वजह से है आज के ख़ास दिन पापा जी के पैसे से उन्ही को यह तोहफा हमने दिया है :-)

सोमवार, अक्तूबर 04, 2010

बी.बी.सी.के हिसाब से अब जम्मू कश्मीर भी भारत में नही . यह देश द्रोह है


यह  बी.बी.सी. ने ना सुधरने की कसम खा रखी है . कामनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका के साथ लगी देशो की जानकारी में भारत के मानचित्र में पूरे जम्मू और कश्मीर को भारत की सीमा से बाहर दिखाया है . 

यह भारत का अपमान है और एक अपराधिक कृत्य . भारत सरकार में थोड़ी भी नैतिकता  है तो तुरंत बी.बी.सी.पर तुरन्त रोक लगाये और अपराधिक मुकद्दमा दर्ज कर कार्यवाही करे . 

आइये इस राष्ट्र अपमान का विरोध करे और बी.बी.सी का बहिष्कार करे . यह देश की सम्प्रुभवता को चुनौती है अभी तक तो गुलाम कश्मीर को नक़्शे में नहीं दिखाया जाता था अब तो जम्मू कश्मीर को भी पाकिस्तान में दिखा . 


शुक्रवार, अक्तूबर 01, 2010

क्या अयोध्या को वेटिकन या मक्का जैसा दर्जा मिले ?



मेरे एक दोस्त है एहतराम सद्दीकी उनका कल शाम मेरे पास फोन आया और कहा यह फैसला तो हम बैठ कर पहले ही कर सकते थे क्यों साठ साल खराब किये . उनकी यह बात मुझे अन्दर तक झकजोर गई . कितना सही कहा एहतराम भाई ने . लेकिन कल के फैसले पर बहुत से राजनितिक दल खुल कर नहीं बोल रहे है . क्या कारण है वह बनावटी ब्यान से सिर्फ खानापूर्ति कर रहे है . और फैसले का स्वागत भी खुले दिल से नहीं कर पा रहे है . शायद फैसले की तरफ दारी उन्हें सेकुलर ना रहने दे . इसलिए कहा जा रहा है आगे की राह खुली है असंतुष्ट पक्ष अपील कर सकता है .

अयोध्या  का फैसला जैसा भी है हमें मंजूर है . संतुष्ट तो नहीं फिर भी संतुष्टि है चलो मान जाओ . और हम तो जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये को मानने वाले है . १/३ ,१/३ ,१/३ भी हमें मंजूर है लेकिन फैसले का क्रियान्वन होना बहुत जरुरी है . कैसे होगा कब होगा इसका फैसला जल्द होना चाहिए . और उसके लिए एक योजना हमारे दिमाग में है जो आपके सामने है . 


मुस्लिम इस फैसले से इसलिए भयभीत किया जा रहा उसे याद कराया जा रहा है अयोध्या तो झांकी है मथुरा ,काशी बाकी  है . लेकिन इन बातों पर रोक लगानी पड़ेगी . अयोध्या अयोध्या है इसे औरो से जोड़ना ठीक नहीं . यह भारत के भविष्य के लिए भी सेहतमंद नहीं . इसलिए जो एक क़ानून बना था कि १९५० के बाद जो पूजा स्थलों का स्टेट्स था वह बरकरार रखा जाए उसे सखती से लागू किया जाए और कही अदालतों में इस तरह के मामले है उन्हें तुरंत निपटाया जाए . अगर समझदार मुसलमानों को समझाया जाए तो उन्हें आपति नहीं होगी यह मुझे विशवास है . 


राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक के तौर पर अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो . यह देश के लिए एक सौहार्द का एक तीर्थ हो .निश्चित मानिए अयोध्या का राम मन्दिर जिस दिन बन गया उसी दिन से भारत झूम कर प्रगति की तरफ बढता जाएगा और एक बार फिर से विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त कर लेगा .

मैं यह भी नहीं कहता अयोध्या को वेटिकन और मक्का  जैसा  दर्जा दिया  जाए लेकिन अयोध्या को अयोध्या रहने देना चाहिए . अदालत का फैसला आम लोगो ने तो तहे दिल से स्वीकार कर लिया है लेकिन जिनकी रोटी इस मुद्दे से चल रही थी वह कैसे अपने पेट पर पड़ी लात को सह ले . वह खुराफाती लोग मिल कर इस फैसले का दबी जबान से विरोध कर रहे है . और परेशान है अभी तक सड़क पर धुँआ क्यों नहीं दिख रहा . लेकिन समझदार जनता समझ चुकी है इन बाज़ीगरो और सौदागरों को इसलिए इनकी दुकाने बंद हो जाए तो अच्छा है .

गुरुवार, सितंबर 30, 2010

खुशबु आ नहीं सकती कागज़ के फूलो से सच्चाई चुप नहीं सकती बनावटी उसूलो से

खुशबु आ नहीं सकती कागज़ के फूलो से 
सच्चाई चुप नहीं सकती बनावटी उसूलो से 

जब अयोध्या का फैसला सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा तो क्या देश में मार्शल ला लागू होगा ?

डरता हूँ मैं यह सोच  कर जब अयोध्या का फैसला सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा तो क्या देश में मार्शल ला लागू होगा ? क्या सेना को देश की कमान अपने हाथ में लेनी होगी ? एक उच्च न्यायालय के फैसले को लेकर जब इतना डर पैदा किया जा रहा जबकि हर पक्ष फैसला मानने के लिए तैयार है .

कान पक गए सुनते सुनते कि इतने पेरा मिलेट्री फ़ोर्स लगा दिए है . सेना और वायु सेना को अलर्ट कर दिया गया है . जगह जगह सीमाए सील कर दी गई है . क्या है यह सब . ................ कौन सी वह ताकते है जिनसे इतना भय है . प्रधानमंत्री , गृहमंत्री अपील कर रहे है शान्ति  की . सभी धर्मगुरु अपना ब्यान दे रहे है शान्ति बनाए रखे .

आज के इस फैसले के बाद एसा तो हो नहीं सकता की असफल पक्ष सुप्रीम कोर्ट ना जाए . कोई यह क्यों नहीं समझाता आज का फैसला मन्दिर और मस्जिद का नहीं उस विवादित जमीन की मिलकियत का है .आम लोग आज मन्दिर और मस्जिद की फैसला मान बैठे है . और यह फैसला अयोध्या के वर्तमान स्टेट्स पर कोई फर्क नहीं डालेगा .

अपील की जा रही है इंसान बनने की हिन्दुस्तानी  बनने की . क्या बकवास है यह ............. अपीलकर्ता  क्या समझते है अपने को क्या आम आदमी जाहिल है . इन्ही अपील कर्ताओं से अपील है कृपया आग में घी का काम ना करे आम आदमी इतना समझदार है कि वह इन खुराफातो से बहुत दूर रहता है . सड़क पर आग से ज्यादा जरुरी समझता है वह अपने चूल्हे की आग को .

भावावान राम से प्रार्थना है सबको सन्मति प्रदान करे .

रविवार, सितंबर 26, 2010

मेरी इकलौती बेटी जिसका आज जन्मदिन है .

आज के दिन मेरे घर में एक जश्न का सा माहौल  रहता था . आज ही मेरी बेटी का जन्म हुआ . एक ईश्वर का उपहार मिला हमें आज ही के दिन . हिन्दू तिथी के हिसाब से उस दिन अनंत चौदस था एक बहुत ही शुभ दिन .

मेरी बेटी के लिए यह दिन एक उत्सव से कम नहीं होता कई हफ्तों से तैयारी चलती  थी गिफ्ट ,रिटर्न गिफ्ट ,केक सब का चयन उसी के द्वारा किया जाता था . सभी के लिए हर्षोललास का दिन हुआ करता है यह दिन .

लेकिन इस साल वह हास्टल में है पिछले साल तो उसे छुट्टी मिल गयी थी और उसने अपना जन्मदिन उसी जोर शोर से मनाया था . लेकिन इस बार छुट्टी नहीं मिली . जिन्दगी में पहली बार वह हमारे साथ नहीं थी . वह नैनीताल में पढ़ती है और बारिश और बाढ़ के कारण इस समय नैनीताल से सड़क संपर्क कटा हुआ है . और उसके स्कूल की टेलीफोन लाइने भी इसी कारण से खराब है सो उससे बात करनी भी मुश्किल हो गई .

लेकिन ईश्वर ने हमारी सुन ली और शाम को हमारी उससे बात हो गई . उसने हमारा ही ढांढस  बढ़ाया क्योकि हम लोग बहुत परेशान हो चुके थे . उसकी बातों को सुनकर हम अचम्भित थे . उसी ने कहा कि ज्यादा मोह सही नहीं . उसकी माँ टिपिकल भारतीय माँ की तरह उदास थी और उससे बात करते समय रो दी तो उसने मुझ से कहा मम्मी को ज्यादा पानी पीने को मत देना क्यों की वह आँखों से ज्यादा पानी निकाल दे देती है .

 वह हमारी  इकलौती बेटी है हमारे खानदान का चिराग वह भी नाम रोशन करने वाली . हमें गर्व है कि हमारी बेटी हमारा नाम आगे बढ़ाएगी . आज तक हमें यह नहीं लगा कि एक बेटा होता तो ........................ हमारी बेटी लाखो बेटो से आगे है . और जो उससे मिलता है हमेशा उसी की बाते करता है .
मै और मेरी बेटी 

गुरुवार, सितंबर 23, 2010

बी.बी.सी. को यह क्या हो गया ......

यह लेख सत्य घटना पर आधारित है किसी की भावनाये आहत हो सकती है . सत्य कडवा होता है इसका विशेष ध्यान रखा जाये .  


आज से कई साल पहले मेरा एक जानकार  बाल काटता था . गांव मे एक छोटा सा सैलून था . एक कुरसी और एक छोटा सा शीशा  और थोडे से औजार . बाप दादो से यह व्यव्साय उसे मिला था . थोडा बहुत पढा लिखा था वह . बहुत सालो  से उससे मुलाकात नही हुई थी . अभी कुछ दिन पहले वह मिला उसकी जेब मे तीन पैन और हाथ मे एक डायरी थी जो मैने बाद में देखी हाल चाल लेने के बाद मैने उससे पूछा और काम धन्धा कैसा चल रहा है वह इस सवाल पर कुछ असहज हुआ और बोला अब हम पत्रकार है .मेरे ध्यान मे आया कोई चीखता भारत , उजडता चमन जैसा कोई २ पेज का अखवार होगा जिसमे वह काम करता होगा . लेकिन मै तब भौचक्का रह गया जब मुझे उसने बताया कि वह दुनिया के सबसे ज्यादा पढे जाने वाले अखवार का सम्वाददाता है .

ऎसे ही कल जब में बी.बी.सी के हिन्दी बेबसाइट को देख रहा था तभी मुझे उनके रिपोर्टर द्वारा लिखित ब्लाग पडने को मिला .शीर्षक था बाबरी ,गोधरा , जय श्री राम . कोई सुशील झा है जो बी.बी.सी. के सम्वाददाता है  उनके द्वारा लिखा यह लेख था .मुझे यह लेख पढते ही अपने वाले पत्रकार की याद आ गई . लेख की शुरुआत झा जी ने क्रिकेट खेलते हुये जब वह ११ वी कक्षा के छात्र थे से की है -


"बात बहुत पुरानी नहीं है...बस 17-18 साल..मैं ग्यारहवीं में पढ़ता था. दिन के ग्यारह बजे होंगे. हम सड़क पर क्रिकेट खेल रहे थे. तभी एक रिक्शा और उसके साथ लोगों का एक गुट आता हुआ दिखा...पास आए तो हमने देखने की कोशिश की कि आखिर रिक्शा पर है क्या?
कुछ नहीं था एक ईंट थी जिसके सामने कुछ रुपए पड़े थे और साथ चलने वाले, लोगों से कह रहे थे राममंदिर के लिए दान दीजिए. लाउडस्पीकर पर घोषणा हो रही थी कि इस ईंट से मंदिर बनेगा.
कारवां गुज़र गया लेकिन उसकी धूल कुछ महीनों बाद दिखी जब पता चला कि कहीं कोई मस्जिद तोड़ दी गई है .

झा जी की इन चंद लाइनो ने मुझे हिला कर रख दिया मुझे तरस आया बी.बी.सी. पर जो विश्व में लोकप्रिय और विश्वसनीय है का सम्वाददाता जो ११ वी कक्षा का छात्र था तब यह नही जानता था कि भारत में कोई मन्दिर मस्जिद विवाद भी है जबकि  उस समय यह विवाद चरम पर था . छोटे बच्चे भी जानते थे कि क्या हो रहा है . इससे पता चलता है झा साहब का उस समय मानसिक क्षमता क्या थी . वह कोई गोद खेलते बच्चे नही थे जो यह ना जाने देश मे क्या चल रहा है . वह उम्र के उस दौर मे थे जब बच्चा तरुण हो जाता है और एक साल बाद १२वी पास करके अपने जीवन के लक्ष्य को निर्धारित कर लेता है . 

खैर पूत के पांव पालने मे दिख गये लेकिन बी.बी.सी से ऎसी उम्मीद नही थी कि वह इस क्षमता के व्यक्ति को अपना रिपोर्टर बनाये . इन सब बातो से बी.बी.सी पर तरस आना लाजमी है . आज तक बी.बी.सी की विश्वसनीयता उनके रिपोर्टर पर ही थी . मार्क टुली को कौन भूल सकता है उनकी रिपोर्ट पत्थर की लकीर होती थी . लेकिन झा जैसे रिपोर्टरो पर अगर बी.बी.सी चलेगी तो उसका भगवान ही मालिक है . 






मंगलवार, सितंबर 21, 2010

हम तो डूबे है सनम ................ बा्ढ लाईव

बाढ़ भीषण हो गई . बाढ़ में डूबा मेरा फ़ार्म . जहाँ आज तक कभी बाढ़ का पानी नहीं पहुचा इस बार पहुच गया है . गाँव के बुजुर्ग कहते है इतनी बाढ़ तो कभी नहीं आई . इससे पहले एक बार सन १९७१ में भी ऐसी बाढ़ आई थी तब भी इतना पानी तब भी नहीं था . 



मेरा डूबा हुआ लॉन 



पुल से जो पेड़ दिख रहे है वह मेरे है और पेड़ से पहले ८ फीट की ऊँची दीवार है जो पानी में डूबी हुई है 


डूबे हुए खेत

सोमवार, सितंबर 20, 2010

मां से बिछडे हुये हो गये १९ साल

माँ 
आज मुझे अपनी माँ से बिछड़े १९ साल हो गए . एक बहुत लंबा अरसा .... मैं उस समय २० साल और १४ दिन का ही था . मेरी बहिन की शादी हो चुकी थी . पिता जी उस समय सांसद थे . एक छोटे  से आपरेशन मे हुई लापरवाही ने  मेरी माँ को मुझ से दूर कर दिया . मेरी माँ मेरे पूरे परिवार की धुरी थी . 






बहुत चाहते हुए भी मैं कुछ नहीं लिख पा रहा हूँ . सच में आज सब कुछ है हमारे पास सिर्फ माँ को छोड़ कर . आज का दिन मेरे लिए सबसे मनहूस दिन है . 

ईश्वर से प्रार्थना है किसी से उसकी माँ ना छीने .

माँ 
तुम प्रेरणा हो 
तुम शक्ति हो 

शनिवार, सितंबर 18, 2010

मै भी दर्शन कर आया रामलला और अयोध्या के .

अयोध्या राम की अयोध्या खामोश है ,चिंतित है . कल ही मैं अयोध्या में रामलला के दर्शन को गया था . जिन्दगी में पहली बार मैं अयोध्या गया .मेरे बरेली से अयोध्या ४०० कि .मी . दूर है . सुबह ४ बजे चल कर दोपहर तक मैं अयोध्या पहुच गया . रास्ते में भयंकर बारिश थी जो  सिर्फ लखनऊ को छोड़ कर बाकी सब जगह मिली . फैजाबाद से जैसे ही अयोध्या के लिए बढ़ा तो मन में श्रद्धा और साथ में भय भी था .

 २४ के फैसले को लेकर जो मीडिया में हाहाकार मच रहा है वह मुझे अयोध्या में नहीं दिखा . अयोध्या मैं घुसते ही अयोध्यावासियो से ज्यादा तरह तरह के सुरक्षा कर्मी देखकर भय और पुख्ता हुआ . पूरी मुस्तैदी से बारिश में भीगते हुए यह जवान अयोध्या के वातावरण में इस बात के संकेत दे रहे थे तूफ़ान आने को है .

और अयोध्यावासी भी चिंतित थे आगे आने वाले समय को लेकर . 


इसके आगे हमने अपना कैमरा   और सभी  समान  कार  में  रख  कर  जन्मभूमी  की  और  बढ़  गए   . कई  बैरियर  पार  करके  सुरक्षाकर्मियों  और  अयोध्या वासियों की घूरती आँखों से होते हुए कोप भवन के सामने जन्मभूमि के अन्दर जाने वाले गेट से बहुत सी जांच कराकर अन्दर घुस गए . इस प्रक्रिया में हमें लगभग एक घंटा लगा . एक लोहे का बाड़ा सा बना है जिसमे श्रद्धालू चलते  है . वह घुमाव दार रास्ता जहा कई जगह चेक पोस्ट बनी थी से होता हुआ   एक टीले के पास पहुंचा जहाँ टेन्ट में इस समय राम लला विराजमान है .अनुपम सुन्दर रामलला के दर्शन करते ही सब कष्ट विदा हो गए . हमारे साथ लाइन में कई तीर्थयात्री जो तमिलनाडू के थे मंत्रमुग्ध से दर्शन लाभ ले रहे थे लेकिन सुरक्षा कर्मियों की सखती के कारण कुछ ही पलो का श्री राम से साक्षात्कार  हुआ . उस परिसर में श्री राम के अलावा सिर्फ तरह तरह के सुरक्षाकर्मी और शैतान बंदरो का ही जमावाडा था .

मुझे गर्व था कि मैंने जिन्दगी में पहली बार अपने आराध्य की जन्मभूमि के दर्शन किये थे . सूनी अयोध्या और जन्मभूमि के आस पास सिर्फ बूटो की आवाज़े ही सुनाई दे रही थी . लौटते समय हनुमान गढ़ी पर हनुमान जी के दर्शन करके उनसे यही माँगा कि अयोध्या को सिर्फ अयोध्या ही रहने दो .

अयोध्या में घुमते समय वहां के स्थानीय निवासियों से २४ तारीख के बारे में बात हुई . किसी ने भी इस विषय में रूचि नहीं दिखाई . पटरी पर लौटी अयोध्या अब पटरी से उतरने को तैयार नहीं दिखती . चलते चलते एक महलनुमा मन्दिर की यह तस्वीर मुझे बहुत पसंद आई जो शायद कह रही थी अब अयोध्या में तोपों से सिर्फ परनाले ही चलेंगे गोले नहीं . कोई आग नहीं सब शीतल शीतल .



बुधवार, सितंबर 15, 2010

२४ सितम्बर एक फैसले की घड़ी

२४ सितम्बर एक फैसले की घड़ी .......... शायद सदियों का इंतज़ार खत्म हो जाएगा . अयोध्या के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ जाएगा .


 राम जन्म फिर सदियों तक जन्मभूमि के सम्मान में बना मन्दिर फिर बाबर का सेनापति मीरबाकी द्वारा विध्वंस फिर सदियों तक उसका बदला लेने के लिए प्रयास फिर ६ दिसंबर ...................... और अब यह फैसला . यह फैसला पहला और आख़िरी नहीं होगा . इसके बाद भी सर्वोच्च अदालत है और उसके बाद संसद . फिर भी इतिहास में दर्ज होगा यह फैसला .


फैसला किस के पक्ष में हो या किस के विपक्ष में कहा नहीं जा सकता . लेकिन नीर छीर विवेक से होगा तो सबको मालूम है क्या फैसला आयेगा .


 खैर जो होगा सो होगा दुकानदार दुकाने सजाने में लगे है . बाज़ीगर करतब दिखाने को तैयार है .तवे गर्म हो रहे है रोटी जो सेकनी है इस आग में . धुँआ देख हवा करने आ रहे है राख में से आग को कुरेद कर दावानल की परिस्थितिया उत्पन्न हो इसी प्रयास में सब लगे है . 


उस दिन का हम भी इंतज़ार कर रहे . तब तक  जय राम जी की तो कहना ही पडेगा . 

सोमवार, सितंबर 13, 2010

धीरुभाईज्म


ब्लोगिंग अपने आप में एक लाइलाज बीमारी है . उस पर कोढ़ में खाज वाली बात हो जाती है पुस्तको के पढाने की आदत . अभी दिल्ली से बरेली ट्रेन से आने का सौभाग्य मिला . नईदिल्ली स्टेशन पर देखा देखी बुक स्टाल पर खडा टाइम पास कर रहा था तभी नज़र पढी धीरुभाईज्म नाम की किताब पर . जो धीरू भाई अम्बानी के सहयोगी रह ए. जी कृष्णमूर्ति ने धीरू भाई की कार्य पद्धति पर लिखी है . धीरू भाई की सफलता और वह भी फर्श से अर्श तक का सफ़र के पीछे जो उनका दर्शन था उसी को धीरुभाईज्म के नाम से लिखा है . और पुस्तक की प्रस्तावना लिखी है मुकेश अम्बानी ने . 


धीरुभाई के हज़ारो आलोचक है लेकिन करोडो प्रसंशक भी . एक साधारण मैट्रिक पास लड़का जो एक प्राइमरी मास्टर का पुत्र है सिर्फ अपने आप कार्य पद्धिति से ही व्यापार जगत में जीवंत किदवंती बन गया हो के बारे में पढ़ना तो जरुर चाहिए . अम्बानी के ब्रह्म वाक्य " बड़ा सोचो ,तेज़ी से सोचो व सबसे पहले सोचो . विचारों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता " अपने आप में सफलता का मूलमंत्र है . 

धीरुभाईज्म में धीरू  भाई के दर्शन को १५ भाग में बाटा गया है 

१. आगे बड़े व मदद करे 

२. अपने दल का सुरक्षा कवच बनो 

३. मूक दानी बनो 

४. " बड़े -बड़े सपने देखो ,लेकिन खुली आँखों से "

५. गलबाहीं देने वाला नेता 

६. आपूर्ति मांग पैदा करती है 

७. धन अपने आप में कोई प्रोडक्ट नहीं यह बाय प्रोडक्ट है 

८. व्यवसायी को अधिकार दो 

९. अपनी कक्षा बदलते रहो 

१०. आशावादिता 

११. हर व्यक्ति मित्र है 

१२. बड़ी सोच 

१३. सपनों की डोर थामे रहो 

१४. अपने लोगो पर दाव लगाओ 

१५ .सकारात्मक  बनो 

कृष्णमूर्ति ने सरल शब्दों में इनकी व्याख्या की है . मेरे हिसाब से यह पुस्तक एक बार पढनी जरुर चाहिए . धीरू भाई कितने भी विवादास्पद रहे हो कितने भी क़ानून अपने हिसाब से तोड़े मरोड़े हो लेकिन धीरू भाई अम्बानी से सफलता से  प्रेरणा तो ली ही जा सकती है . बहुत  बुराई सही जैसा कुछ लोग मानते है  लेकिन उनसे ज्यादा बहुत अच्छाई होंगी धीरू भाई अम्बानी में जिसके कारण सफलता के शिखर  पर पहुंचे .

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नोट :- मेरा नाम धीरू भाई अम्बानी से मिलना एक इतेफाक है जब मेरा नाम रखा गया था तब धीरू भाई अम्बानी धीरू भाई अम्बानी नहीं थे . मैं तो मज़ाक में कहता हूँ जब से मैं पैदा हुआ तभी से धीरू भाई अम्बानी ने तरक्की शुरू की . शायद मेरे भाग्य का कोटा धीरू भाई अम्बानी को प्राप्त हो गया . और एक सच जब से अम्बानी का निधन हुआ है तब से मैं आर्थिक मज़बूत हो  रहा हूँ ईश्वर की कृपा से .  




शनिवार, सितंबर 11, 2010

खुशवंत सिंह का मानसिक दिवालियापन .

९० साल से ज्यादा के हो गए खुशवंत सिंह शायद अपना मानसिक संतुलन खो बैठे है या सस्ती लोकप्रियता का बुखार उन्हें चढ़ गया है . आज उन्होंने अपने साप्ताहिक लेख जो हिन्दी में ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर के नाम से  छपता है   में कलम के सिपाही और शहीदों के खून में एक तुलना की है . उस बूढ़े माणूस ने  ओसामा बिन लादेन ,और भिंडरावाले के साथ वीर सावरकर को भी खडा कर दिया है . कितना  नीचता पूर्ण कृत्य है यह .

वीर सावरकर के लिए नहीं हम लोगो के लिए शर्म की बात है .कहाँ वीर सावरकर जिन्होंने देश की आजादी  के खातिर दो आजन्म कारावास   की सज़ा पायी . जो देश की आज़ादी के लिए कालापानी में कोल्हू में बैल की तरह जुते रहे  को आज अंग्रेजो की चाटूकारिता कर रोटी कमा कर खाने वाले परिवार का एक सदस्य आतंकवादी की लाइन में खडा कर रहा है . उसे आज वीर सावरकर का संसद में लगा चित्र भी आपतिजनक लगता है .

लादेन , भिंडरावाला के साथ सावरकर को खडा करना खुशवंत सिंह के मानसिक दिवालियापन का सबूत है . अब खुशवंत सिंह को लिखना छोड़ कर सिर्फ स्काच और अपनी बूढी होती महिला दोस्तों का ही ध्यान रखे जो  उनके शेष जीवन के लिए बेहतर रहेगा .

गुरुवार, सितंबर 09, 2010

आप कौन से नम्बर के भारतीय हो ?

 बच गये बाल बाल बच गये . आज इस बात की खुशी है की २ नम्बर का होना कितना फ़ायदेमंद है . मुझे गर्व है मै २ नम्बर का हिन्दुस्तानी हूं. क्योकि हर तीसरा हिन्दुस्तानी भ्रष्ट है . ऐसा मानने वाले सी बी सी मि.सिन्हा क्या कहना चाहते है पता नही .लेकिन इतनी लम्बी और महत्वपूर्ण पद से रिटाइर सिन्हा साहब आज तक यह नही जान पाये हिन्दुस्तान  कहां है .

भारत में ८० % जनता गांव मे रहती है . गांव मे रहने वाले मेहनत मजदूरी करने वाले भूख से लडकर मरने वाले कब से भ्रष्ट की श्रेणी मे आ गये . हां सिन्हा साहब जहा रहते है और जहा उन्होने नौकरी की है वहा जरुर हर व्यक्ति भ्रष्ट है . वहां ना कोई एक नम्बर वाला ईमानदार है ना दो नम्बर वाला और ना ही तीन नम्बर वाला . पता नही तीसरा कह कर किसे बचाना चाहते है सिन्हा साहब .  
दिल्ली मे एक दो तीन नम्बर पर है राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री,और सोनिया गान्धी . और सी वी सी के अनुसार हर तीन मे से एक भ्रष्ट है . इन तीनो मे से कौन वह यह बताये . खैर जो है सो है .

एक सवाल आप सब से आप कौन से  नम्बर के भारतीय हो ?

मंगलवार, सितंबर 07, 2010

धन्यवाद धन्यवाद और धन्यवाद

धन्यवाद धन्यवाद और धन्यवाद . इसके सिवा और कुछ कह भी तो नहीं सकता . ५ सितम्बर को रात में सोया था तब तक आने वाली खुशियों से अन्जान था . ठीक १२ बजे मोबाइल बजा उधर से आवाज़  थी आपको जन्मदिन की शुभकामनाये .क्या आपको डिस्टर्व तो नहीं किया . कुछ सैकेंड तो मैं कुछ समझ नहीं पाया लेकिन तभी चेतना आयी और समझ आ गया यह आवाज़  तो अपने पाबला जी की है . पाबला जी एक ऐसे ख़ास रिश्तेदार है जिन्हें अभी तक देखा ही नहीं . लेकिन सुख दुःख में पाबला जी हमेशा साथ खड़े मालूम होते है . पाबला जी से बात हो ही रही थी तभी फोन पर एक काल ने और दस्तक देना शुरू की .

वह थे दीपक मशाल जी . सात समुन्दर पार से बधाई मिलने लगी .मैं तो सोच भी नहीं सका इतनी दूर दूर से भाई लोग मेरा जन्मदिन मना  रहे  है जबकि  घर  वाले  अभी सो  ही रहे  है .दीपक मशाल जी को  तो धन्यवाद के शब्द भी कम पड़ रहे है . तभी एक फोन और बजा वह था अपने ललित शर्मा जी का . ललित जी को भी धन्यवाद दिया और बधाई ली .

खुशियाँ ज्यादा देर तक साथ नहीं रही मैं उस दिन नोयडा में था और जिस होटल में था वहा अपना बी एस एन एल का नेटवर्क दम तोड़ गया . और सुबह तक मृत रहा . कई लोगो से बात नहीं हो पाई जिसका मुझे खेद है . लेकिन एक खुशी इस बात की है ब्लॉग ने बहुत से साथी दिए इससे अच्छा उपहार और क्या  हो सकता है .

उसके बाद जब घर आकर शाम को जब मेल चैक की तो वहा  अग्रज समीर जी , दिनेशराय द्विवेदी जी ,नरेश सिंह जी सहित कई लोग वहा वधाई दे रहे थे . और पाबला जी के ब्लाग  पर तो वधाईयां  ही बधाईयाँ मौजूद थी .

आज तक मेरा जन्मदिन इतनी शानदार तरीके से नहीं मना .वैसे मैं भी जन्मदिन नहीं मनाता हूँ और कई सालो से अपना फोन भी बंद कर लेता था इस दिन . परन्तु पाबला जी ने वह परम्परा समाप्त करा दी .

बुधवार, सितंबर 01, 2010

आतंक कलर ब्लाइंड होता है

आधा अगस्त अस्त व्यस्त रहा मेरा . अब गाडी पटरी पर लग रही है . अभी बे कार हूँ क्योकि अपनी तो कार चोरी हो चुकी है और बिना क्लेम मिले नई कार सोचना अपने से मज़ाक करना ही है . खैर जब वह  दिन ना रहे तो रहेंगे यह भी नहीं .

बहुत दिनों से ब्लॉग से भी दूर रहा . नोयडा के एक अस्पताल में १० दिन तीमारदारी में रहा जहां इन्टरनेट सुबिधा नहीं थी और शायद जो थी वह सिर्फ विदेशी मरीजों को ही उपलव्ध थी . कोई बात नहीं हम को तो सदियों से आदत है इस तरह के दुर्व्यवहार की . इन १५ दिनों में हालात जैसे भी हो कई समाचार पढ़कर देखकर लिखने का मन करता था . लेकिन मजबूर था . फिर भी दो चार विषय पर दो चार लेने तो लिख ही सकता हूँ .....

१- सांसदों का वेतन भत्ते बेहताशा बड़ा दिए गए . मज़ा आ गया .............. अब कोई गरीब नहीं रहेगा सांसद लेकिन जिन सांसदों ने उसका विरोध किया उन्ही सांसदों की खबर सुनने को आतुर हूँ उन्होंने बढोतरी को ठुकरा दिया . शायद बड़ी बिंदी वाली बहन जी या उनके देवर समान साथी जल्द घोषणा करे . पर मुझे मालूम है आती हुई लक्ष्मी ठुकराता कौन है .

२- भगवा आतंक का हौआ मचा दिया चिदम्बर ने थोड़ी देर को नक्सल ,कश्मीर को भुलावे में तो डाल ही दिया . अब पढ़े लिखे जो कहें वह सही ........पर मैं जानता हूँ यदि भगवा में थोड़े आतंक की कीटाणु होते तो हरा काला सफ़ेद कही ना होता . क्योकि सबसे पहले सदियों से भगवा ही तो था . वैसे आतंक कलर ब्लाइंड होता है यह सब जानते है . और आज सबसे ज्यादा तो आतंक रंग बिरंगा है पट्टियों वाला  जिसके किनारे पर कई तारे जड़े है .

३- आखिर  यमुना की बाढ़ ऐसा लगा जैसे हथिनी कुंड से छोड़ा गया पानी सिर्फ  दिल्ली को ही डुबोयेगा . टी वी पर समाचार चैनल देखकर तो ऐसा ही लगा .यमुना का सफ़र जो इलहाबाद तक   है सिर्फ दिल्ली तक  ही महसूस   हो रहा था इन्हें . बिलकुल कूप मंडूक है हमारे चौथे खम्बे वाले . वैसे अगर आपको बाढ़ देखनी हो तो हमारे यहाँ आइये हजारो बीघा जमीन डूबी हुई है . जिसमे ४० बीघा मेरी भी है .

शेष शुभ अब नियमियतिता बनी रहे यही कामना है किशन कन्हैया से

रविवार, अगस्त 22, 2010

यह मुसीबते अकेले क्यो नही आती .

यह मुसीबते एक साथ ही क्यों आती है अकेले क्यों नहीं . पिछले कई दिनों से कई मुसीबते एक साथ सामने आ गयी . अभी कुछ नए और पुराने व्यापार के सिलसले में बिजी हूँ . तभी अचानक मेरे जीजा जी के पिताजी को हार्ट अटैक हुआ और उन्हें नोयडा के मेट्रो हास्पिटल ले जाना पड़ा . एंजियोग्राफी के बाद तुरंत बाई पास की सलाह दी गई . हम लोग परेशान थे ही तुरंत खून और पैसे की व्यवस्था करनी थी इसलिए तुरंत अपने शहर को गए . 

वहा से सब व्यवस्था हासिल कर अपनी कुछ ही महीने पुरानी टाटा सफारी से हास्पिटल पहुचे . जैसे ही हम अन्दर गए और थोड़ी देर बाद बाहर आये तो पता चला की सफारी चोरी हो चुकी है . गाडी तो गई ही गई उसमे रखा सब सामान ,कपड़ा लित्ता ,कागज़ और रुपये भी चोरी हो गए . रिपोर्ट लिखवा दी . जो नुक्सान हुआ वह कुछ ज्यादा ही था . 

संतोष इस बात का है आपरेशन सफल हुआ . अब वह ठीक है और गहन चिकित्सा कक्ष में है एक आध दिन में वार्ड में शिफ्ट हो जायंगे . 

इस घटना से पुरानी कहावत सही साबित हुई . कि मुसीबते अकेले नहीं आती .

गुरुवार, अगस्त 12, 2010

यूनाईटेड स्टेट्स आफ़ इण्डिया

स्वायत्तता सिर्फ कश्मीर को क्यों ? सब राज्यों को क्यों नहीं . कश्मीर से लेकर केरल तक ,गुजरात से बंगाल तक और पूर्वोत्तर के राज्यों को भी स्वायत्तता दे देनी चाहिए . अपने क़ानून बनाये यह राज्य . अपने हिसाब से चलाये मुख्यमंत्री अपने राज्य को गवर्नर बन कर . अपनी फौजे  बनाए .और इंडिया के साथ रहे .

यह कायराना विचार कमजोर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मूंह से निकाले गए ब्यान से आया जिसमे कश्मीर की स्थिति को देखते हुए और स्वायत्तता देने की बात कही गयी है . लाखो करोड़ खर्च  कर दिए इन कश्मीरियों { यहाँ पर कश्मीरियों से मतलब उनसे है जो आज कश्मीर में रह रहे है } पर फिर भी वह पाकिस्तान परस्त है . आतंक के हिमायती है और इन्डियन डोग गो बैक के नारे लगाते है . फिर भी हम सौ सौ जूते खा कर उन्हें समझाने की कोशिश कर रहे है . हमारी कमजोर और नाकारा सरकारे हमें आज तक नीचा दिखाती आ रही है .

 यदि  सरदार पटेल ना होते तो शायद सौ दो सौ कश्मीर पूरे हिन्दुस्तान में पल रहे  होते . कश्मीर पर उनकी नहीं मानी गई तो यह हाल हुआ . ५०० से ज्यादा छोटे बड़ी स्टेट मिला दी भारत में लेकिन कश्मीर गृह राज्य था हमारे पहले प्रधानमंत्री का और उनके चहेते शेख अब्दुल्ला को वहाँ  की बागडोर देना ही गुनाह हो गया . अब्दुला ने ही कश्मीर मिलिशिया नाम से एक सेना का भी गठन किया था . जो बाद में बड़ी मुश्किल से जम्मू कश्मीर लाइट इन्फैंट्री बनी .

जब कश्मीर की बात होती है तो सिर्फ कश्मीर का ध्यान रखा जाता है जम्मू या लदाख का नहीं . कभी वहां के लोगो से पूछे किस दोयम दर्जे में रह रहे है वह . खैर उनकी यह नियति हमारी यह सरकार की वजह से ही है . अगर इस कमजोर  सरकार पर अंकुश  नहीं लगाया तो यू एस आई और उसके बाद अपनी ढफली अपना अपना राग .

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर चिंतन करे की कितने साल और तक यह स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा . मुझे तो नहीं लगता यह दिवस अक्षुण रह पायेगा .

सोमवार, अगस्त 09, 2010

कश्मीर की समस्या कश्मीरियों की नहीं है कश्मीर की समस्या हिन्दुस्तानियों की है .

 हड़बड़ी में आज़ादी लेने के चक्कर में आधा कश्मीर, आधा पंजाब ,आधा बंगाल और पूरा सिंध हमने खो दिया .भारत की आजादी के समय एक अधूरा  कश्मीर हमें मिला या कहें मेजर सोमनाथ शर्मा जैसे परमवीरो की शाहदत के कारण इतना बच सका . कश्मीर के असली कश्मीरियों को मार मार के भगा दिया और हम उन जहरीले सापों को दूध पिला पिला कर आज तक पाल रहे है जिन्होंने यह कुकृत्य किया . चंद खानदान घुमा  फिरा कर कश्मीर को चला रहे है . और अलगाववादियों को हवा दे रहे है .  हमारी आज तक की सरकारे सिर्फ और सिर्फ बाते ही कर रही है . 

कश्मीर की समस्या कश्मीरियों  की नहीं है कश्मीर की समस्या हिन्दुस्तानियों की है . और उसका फैसला सब हिन्दुस्तानियों को ही मिल बैठ कर करना चाहिए . अलगाववादियों से सिर्फ गोली ही बात करे तो देश के लिए हितकर होगा . समय समय पर अपने सैनिको और अर्धसैनिको का मनोबल तोडा जाता है . मानवाधिकार के नाम पर देश के रक्षको पर अत्याचार होता है . शांतिकाल{?} में ही हजारो सैनिक शहीद हो गए . जितने सैनिक इस में शहीद हुए है शायद ही किसी युद्ध में हुए हो .

हुर्रियत के चलाने वाले आतंकवादी आज कहते है हम १४ अगस्त को आज़ादी का दिन मनाएंगे और १५ अगस्त को शर्म दिवस . और हमारी सरकारे चुप है . राष्ट्र द्रोह को मूक समर्थन देने वाले भी राष्ट्र द्रोही ही है . अगर कश्मीर को भारत में ही जोड़े रखना है तो इसी १५ अगस्त तक इन देशद्रोहियों को जहनूम में भिजवा देना चाहिए .  .








गुरुवार, अगस्त 05, 2010

खुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा जालिम - कहीं ऐसा ना हो यहाँ भी वही काफिर सनम निकले

राम भगवान् राम का बर्थ सार्टिफिकेट चाहिए उन्हें . बहुत चेलेंज हो रहे है मजाके हो रही है . और हम लोग चुप है . हम बर्दाश्त की हद तक खामोश है . क्योकि हम सेकुलर है .................... सेकुलर माने ..............???????????

रोज़ रोज़ हमले सहते सहते मुझे अपने बजूद पर भी शक होने लगा है . मेरी मसे क्यों नहीं भिज रही ,मेरी रीड़ की हड्डी में झनझनाट क्यों नहीं हो रही , क्योकि शायद मैं सेकुलर हूँ ............ सेकुलर माने ..............???????????

देने को तो हर बात का जबाब दे सकता हूँ . पर अंधे के आगे रोय अपनी आँखे ख़ोय ..............

इसलिए आग से मत खेलो पत्थर मत उछालो क्योकि जब पत्थर इधर से फिका तो मुश्किल होगी .

अमन की बात करो चैन की बात करो ,दीन दुनिया की बात करो  . तरक्की की बात करो . अच्छे मुस्तकबिल की बात करो .

चचा ग़ालिब भी कह गए है

खुदा के वास्ते पर्दा  ना  काबे  से  उठा  जालिम 
कहीं ऐसा ना हो यहाँ भी वही काफिर सनम निकले 
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शनिवार, जुलाई 31, 2010

सांप्रदायिक सौहार्द ............ इसे कहते है

अभी कुछ माह पहले हमारा बरेली दंगो में झुलस गया था . होली के रंग छूटे भी नहीं थे दंगो की आग ने मानवता झुलसा  दी थी . दंगो के दोषी माना गया तौकीर रज़ा खान . तौकीर की  तेजाबी जुबान ने सैकड़ो को सड़क पर ला दिया . दुकाने जली ,मकान जले ,अरमान जले . तौकीर को गिरफ्तार किया और दवाब में छोड़ दिया जमानत पर  .

भाजपा जो हिन्दुओ की हिमायती होने का दम भरती है  .ने दंगे की आग पर रोटी सेकी . तो सपा कांग्रेस कहाँ पीछे रहती मुसलमानों के वोट के लिए  घडियाली आसूं बहाए गए . खैर अमन ने फिर चादर तानी लोग चैन में आ गए .

लेकिन यह मैं आज क्यों लिख रहा हूँ ............... क्या मेरे पास विषय ख़तम होगये . नहीं ऐसा नहीं बिलकुल नहीं पर एक घटना मजबूर कर देती है दंगो के पीछे छिपी सियासत को सोचने के लिए . .............

तौकीर रज़ा खान की नियमित जमानत के लिए जो जमानती आगे आये है वह है प्रखर हिंदूवादी भाजपा के एक पदाधिकारी जो भाजपा और तौकीर की जेबी पार्टी इतेहाद ए मिल्लत के सेतु का काम करते है . पिछले  कई चुनाव से तौकीर की मदद से भाजपा लोकसभा चुनाव वहां जीत रही थी इस बार ऐन चुनाव पर तौकीर को ऊँची कीमत देकर कांग्रेस ने अपनी तरफ किया और इस्तेमाल कर फेक दिया . जिससे तौकीर भी दुखी और उनके पुराने दोस्त भी दुखी थे . अब फिर से दोनों एक है . इसका एक ही पैमाना  है यह जमानत .

लेकिन दंगो के पीछे भी अगर यही दोस्ती थी तो ............................. हिन्दू को राम राम और मुसलमान को सलाम
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रविवार, जुलाई 11, 2010

क्वीन बेटन को कामन मैन बेटन क्यों नहीं कहते -वसीम बरेलवी

जो मुल्क कभी यूनियन जैक के गुलाम थे कामनवेल्थ के द्वारा आज भी उस गुलामी को ओढ़े हुए है . आज भी रानी की पालकी कंधे पर उठाये घूम रहे है . कामनवेल्थ गेम दिल्ली में हो रहे है अच्छी बात है लेकिन ब्रिटेन की महारानी की क्वींस बेटन  जो सब गुलाम देशो में घूम कर अब भारत में घूम रही है . अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की तरह बेटन दौड़ रही है और हम स्वागत के लिए पलक पावडे विछा उसका स्वागत  कर रहे है .

सौभाग्य  से यह बेटन  हमारे शहर बरेली में एक दिन और एक रात रही . पूरा सरकारी अमला उसके स्वागत में लगा रहा . तमाम नेता ,अफसर बावर्दी उस बेटन को लेकर दौड़ने में फ़क्र महसूस कर रहे थे . हमारे बरेली के कोहिनूर वसीम बरेलवी साहब भी अनमने से कार्यक्रम में पहुचे . 

वसीम साहब की नाखुशी का कारण कामनवेल्थ गेम के लिए निकली बैटन के नाम से है . क्वींस कहें जाने को वह गुलामी का प्रतीक मानते है . वह चाहते  इस बेटन का नाम कामन मेन बेटन होना चाहिए . उन्होंने इस बात को अपने तरीके से दो शेरो  में कहा-

           

                                           कदम जब आपसी सहयोग की खातिर बढ़ाये थे 
                                           तो हिस्सेदारियों में सब बराबर क्यों नहीं रहते 
                                           हमें यह पूछने का हक है हम आज़ाद भारत है 
                                           क्वीन बेटन को कामन मैन बेटन क्यों नहीं कहते |

                                           क्वीन बेटन को हाथो हाथ लेने पर ख्याल  आया 
                                           आवामी चीज़ रानी बनकर क्यों भारत में आती है 
                                           गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक 
                                            गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है |

 

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

गुरुवार, जुलाई 08, 2010

ऐसा भी एक आज्ञाकारी पुत्र

आज्ञाकारी पुत्रो से इतिहास भरा है अपना . कुछ  ऐसे पुत्र है जो गुमनाम है .किस्से कहानियों में भी जिक्र नहीं हो पाता . ऐसे ही एक पिता पुत्र की कहानी है यह . कोई प्रमाण नहीं इसीलिए कहानी है वैसे हकीकत भी है यह .

रामलाल एक गाँव में रहता था .बहुत गुस्सैल स्वभाव का ,बिना बात के गाली देना उसका प्रिय शगल था . सुबह अपने घर के दरवाजे पर बैठ जाता और निकलने वालो को गाली देने लगता . लोग उससे नाराज़ रहते थे और उसे बुरा भला कहते थे . लेकिन रामलाल के डर के मारे उसके मुहं पर कोई कुछ नहीं कहता . पूरे इलाके में वह कुख्यात था वह . रामलाल बूढ़ा हो चला था . उसकी इच्छा थी कोई उसे भी अच्छा कहें . उसने  मरने के समय अपने पुत्र से वचन लिया वह उसका अंतिम संस्कार तब करे जब कोई उसे अच्छा कहें . और राम लाल मर गया .

पूरा गाँव खुश बबाल  कटा ठीक हुआ  रामलाल मरा . पुत्र के सामने समस्या आ खड़ी हुई कोई उसके बाप को अच्छा कहने वाला नहीं था जो कह दे बड़ा बुरा हुआ रामलाल मर गया कितना अच्छा आदमी था . एक दिन बीत गया बाप की कसम आड़े आ रही थी लाश बदबू छोड़ रही थी . लड़का परेशान क्या करे तभी उसे एक विचार आया . वह घर से निकला हाथ में लाठी जो सामने मिला उसे लठयाया . अफरातफरी मच गई . लोग इधर उधर भागने लगे और कहने लगे इससे अच्छा तो राम लाल था जो बिचारा सिर्फ गाली देता था उसका लड़का तो मारता है .

इस तरह लड़के ने अपने बाप की आख़िरी इच्छा पूरी की . अब सब रामलाल को अच्छा बता रहे थे .

इस आज्ञाकारी पुत्र को सम्मान मिलना चाहिए या नहीं . आप फैसला करे

सोमवार, जुलाई 05, 2010

नरेंद्र मोदी के लश्कर ए तैयब्बा से सम्बन्ध उजागर

नरेंद्र मोदी के बारे में जो दबी छुपी बाते थी आज उजागर हो गई . वह है मोदी के लश्कर से सम्बन्ध . अपने साथी नरेंद्र मोदी को फसते देख लश्कर के आतंकी हैडली ने मासूम निर्दोष इशरत जहाँ को अपना साथी बता दिया . यह वही इशरत जहाँ  है जो मोदी के गुर्गो ने फर्जी मुठभेड़ में मार दिया था . 

बेचारी अदालत और केंद्र सरकार ने इशरत जहाँ  को  मासूम माना था . एक निर्दोष महिला व उसके साथियो को बेहरहमी से क़त्ल कर मोदी ने देश में अशांति फैलाने का काम किया था . नरेंद्र मोदी को कट्टर हिन्दू नेता के तौर पर लश्कर ने ही स्थापित किया जिससे देश में अराजकता फैले . और मोदी को केंद्र सरकार ने जब कटघरे में घेरा तो लश्कर ने अपने साथी को बचाने के लिए उन मासूमो को अपना साथी कहा और अपना फिदायनी तक बताया . यह एक साजिश है फसे  मोदी को बचाने की जो केंद्र और धर्मनिरपेक्ष ताकते कतई बरदाश्त नहीं करेंगी . 

नोट :- यह सब लिखा पर्चा कांग्रेस के एक प्रवक्ता की जेब से रुमाल निकालते समय गिर गया जो १० जनपथ से बाहर निकल रहे        थे . उनके साथ कई स्वनामधन्य टी वी मालिक और पत्रकार भी थे . 







शनिवार, जुलाई 03, 2010

आक्टोपस महाराज की जय

 आक्टोपस महाराज की जय

नए ज्योतिषी आक्टोपस ने पहले भविष्यवाणी कर दी थी जर्मनी  के डिब्बे में बैठ कर की अर्जेंटीना आज हार जाएगा . विश्व कप में लगभग सटीक भविष्यवाणी करने वाले आक्टोपस के संकेत के कारण अर्जेंटीना जैसी टीम ४-० से हार कर घर लौट गई .

क्या यह सम्भव है एक जानवर द्वारा  ज्योतिष जानना . या एक महज इतेफाक है वैसे बहुत से लोग ज्योतिष को महज तुक्का ही तो मानते है . अब ज्ञानी ही बताये क्या सही है . फीफा कप में फुटबाल के अलावा आक्टोपस के तो चर्चे तो है ही .

गुरुवार, जुलाई 01, 2010

और वह फाँसी चढ़ गया ............ आखिर उसे अपनी करनी की सज़ा मिली


वह पूरी जेल में लोकप्रिय था . पूजा पाठी ,कर्मकांडी सब से हँस के ही मिलता था . लोग चकित होते थे वह जेल में क्यों है .कोई नहीं मानता था वह अपराधी हो भी सकता है . उसे क़त्ल के जुर्म में फाँसी की सज़ा हो चुकी थी . और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर मोहर लगा दी थी . राष्ट्रपति से  क्षमा दान के लिए अपील थी इसीलिये वह आम कैदियों के साथ ही रहता था .

सब उसे पंडित जी कह कर बुलाते थे . वह अपने अतीत के अलावा सब बात करता था . बात लगभग ३० साल पुरानी है . पंडित के व्यवहार को देखते हुए उसे तत्कालीन राजनेतिक बन्दियो के साथ जो आपातकाल में जेलों में थे उनके साथ सेवा के लिए रख दिया . पंडित पक्का कैदी था पका मतलब सज़ा याफता . पीले कपड़ो में जब वह भजन गाता था तो उसके चेहरे पर एक ओज सा आ जाता था . राजनेतिक बंदी भी यह मानने लगे थे उसे किसी षड्यंत्र के तहत फसा कर उसे फाँसी के तख्ते पर पहुचा दिया गया है . वक्त के मारे राजनेतिक बन्दियो को उससे हमदर्दी हो गई थी . उसकी मदद के लिए कोशिशे शुरू हो गई . लेकिन तब तक देर हो चुकी थी .

राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका ठुकरा दी . उसकी मौत का दिन मुकर्रर हो गया . फांसी के अपराधी को तन्हाई में रखने के आदेश हो जाते है आज वह आखिरी बार सब कैदियों से मिल रहा था सब उसकी किस्मत पर दुखी थे . एक निरपराध से दिखने वाले  को मौत के मूंह में जाते देख सब को दुःख हो रहा था . तभी एक साथी कैदी ने इन्साफ के खिलाफ ईश्वर को दोषी ठहराया तभी पंडित ने कहा उसके साथ कोई अन्याय नहीं हुआ उसे अपनी करनी की सज़ा मिली है उसने जो अपराध किया उसके लिए तो फाँसी भी सज़ा के तौर पर कम है . यह कह वह हलके हलके तन्हाई की ओर चला गया कभी भी ना लौटने के लिए .

कुछ दिन बाद ही एक सुबह उसे फांसी दे दी गई . कोई उसकी लाश तक लेने नहीं आया क्योकि किसी बात पर उसने अपने पूरे परिवार को मार दिया था .

शनिवार, जून 26, 2010

आपातकाल ---- हमने भी झेला था .

सिर्फ ४  साल का था मैं जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था . आपातकाल  की गाज मेरे घर पर भी गिरी . मेरे पिताजी जनसंघ के पदाधिकारी थे . और हमारे शहर में जनसंघ का ही होल्ड रहा करता था . आपातकाल लागू होते ही सरकार की हिट लिष्ट में मेरे पिताजी भी थे . संघठन के आदेश से पिता जी भूमिगत हो गए और पुलिस का कहर हमारे घर पर वरपा रहा .

चार साल की उम्र में जो मंजर मैंने अपनी आँखों से देखा वह आज तक मुझे याद है . शहर के सबसे ख़ास इलाके में हमारा घर है जो उस समय भी आतंक विरोध की गतिविधियों का केंद्र था . मुझे अब भी रात याद है जब पुलिस ने हमारे घर पर छापा मारा था पुलिस वालो का दीवार पर से कूदना घर के अन्दर कोने कोने की तालाशी लेना सामान को उलट पलट कर देना . मैं ,मेरी माँ, बहिन जो मुझ से दो साल बड़ी है सिर्फ वही घर पर थे .

हमारा चलता हुआ व्यापार  ठप्प  हो गया  . कई  रिश्तेदार  कन्नी  काट  गए  .घर पर रुपया पैसा ख़त्म हो चला था ग्राहक डर के मारे दूकान पर नहीं आते थे लेकिन उस समय कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने हमारे परिवार की मदद की . उनमे एक थे हमारे दूध वाले रामनाथ जिन्हें हम बाबा कहते थे . मेरी माँ ने बाबा से दूध बंद करने के लिए कह दिया बाबा ने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा बेटी पैसा मिले या ना मिले लेकिन बच्चो का दूध बंद नहीं होगा और दो साल तक बिना पैसे के उन्होंने दूध दिया . ऐसे ही थे श्री लक्ष्मण प्रसाद इनकी परचूनी की दूकान थी उन्होंने भी जब सामान का पर्चा नहीं पहुचा तो अपने आप महीने का राशन भिजवाने लगे .ऐसे लोगो का भूलना अहसान फरामोशी ही कहलायेगा .

मेरे पिताजी को  सत्याग्रह कर जेल जाने का निर्देश हुआ . मुझे आज भी याद है पापा सुबह घर आये उस दिन कोई त्यौहार था कई सत्याग्रहियों को गिरफ्तारी देनी थी .लेकिन डर के मारे कोई नहीं आया . पापा अकेले ही घर से नारे लगाते हुए घर से निकले मैं उन्हें बाहर तक छोडने आया . बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और मीसा में बंद कर दिया . जब वह तारीख पर  कचहरी आते थे तब हम लोग मिलाने जाते थे .

किस तरह हमारे परिवार ने वह दिन झेले वह हमारा परिवार ही जानता है लोग डर के मारे पहचानते नहीं थे पड़ोसी नज़र नहीं मिलाते थे . लेकिन हर रात की एक सुबह होती है सूर्य उगा रोशनी हुयी लेकिन दिन आज तक नहीं निकला . आज भी परिस्थितिया आपातकाल की ही तरह है . उस समय तो लाखो लोग विरोध में थे आज अगर फिर ऐसा हुआ तो सत्याग्रही खोजते रह जाओगे . क्योकि सत्य से तो आजकल सब मूहँ फेर लेते है