रविवार, जुलाई 11, 2010

क्वीन बेटन को कामन मैन बेटन क्यों नहीं कहते -वसीम बरेलवी

जो मुल्क कभी यूनियन जैक के गुलाम थे कामनवेल्थ के द्वारा आज भी उस गुलामी को ओढ़े हुए है . आज भी रानी की पालकी कंधे पर उठाये घूम रहे है . कामनवेल्थ गेम दिल्ली में हो रहे है अच्छी बात है लेकिन ब्रिटेन की महारानी की क्वींस बेटन  जो सब गुलाम देशो में घूम कर अब भारत में घूम रही है . अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े की तरह बेटन दौड़ रही है और हम स्वागत के लिए पलक पावडे विछा उसका स्वागत  कर रहे है .

सौभाग्य  से यह बेटन  हमारे शहर बरेली में एक दिन और एक रात रही . पूरा सरकारी अमला उसके स्वागत में लगा रहा . तमाम नेता ,अफसर बावर्दी उस बेटन को लेकर दौड़ने में फ़क्र महसूस कर रहे थे . हमारे बरेली के कोहिनूर वसीम बरेलवी साहब भी अनमने से कार्यक्रम में पहुचे . 

वसीम साहब की नाखुशी का कारण कामनवेल्थ गेम के लिए निकली बैटन के नाम से है . क्वींस कहें जाने को वह गुलामी का प्रतीक मानते है . वह चाहते  इस बेटन का नाम कामन मेन बेटन होना चाहिए . उन्होंने इस बात को अपने तरीके से दो शेरो  में कहा-

           

                                           कदम जब आपसी सहयोग की खातिर बढ़ाये थे 
                                           तो हिस्सेदारियों में सब बराबर क्यों नहीं रहते 
                                           हमें यह पूछने का हक है हम आज़ाद भारत है 
                                           क्वीन बेटन को कामन मैन बेटन क्यों नहीं कहते |

                                           क्वीन बेटन को हाथो हाथ लेने पर ख्याल  आया 
                                           आवामी चीज़ रानी बनकर क्यों भारत में आती है 
                                           गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक 
                                            गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है |

 

15 टिप्‍पणियां:

  1. झाँसी में वसीम बरेलवी को सुनने के लिये सुबह 4 बजे तक जागे थे । गज़ब का लिखते हैं । छोटा और सशक्त, चीरता हुआ जेहन तक । यदि आप उनकी कड़ी चला सकें तो इनायत होगी । ऑडियो हो तो सोने पर सुहागा ।

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  2. बेहद उम्दा शेर ..................और बात सटीक कही है वासिम साहब ने !
    आपका आभार उनकी बात हम तक पहुँचाने के लिए !

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. बेहद खूबसूरत भावपूर्ण शेर. साँझा करने के लिए आभार.

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  5. वसीम साहब के कलाम के तो हम पहले से ही फ़ैन हैं।
    गुलामी नहीं जा सकती हमारी, और हमें तो इन कॉमनवैल्थ खेलों से ही सख्त ऐतराज है।
    बाकी आपकी आज वाली पोस्ट का बेस्ट पार्ट "सौभाग्य"(कटा हुआ सौभाग्य strikethrough) लगा।

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  6. गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक
    गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है |
    जनाब वसीम बरेलवी के तो हम भी फेन हैं, जितना खूबसूरत लिखते हैं, उतना ही खूबसूरत अंदाज़े बयाँ भी है,
    शुक्रिया आपका

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  7. कभी बाबा नागर्जुन ने व्यंग्य किया था-
    आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी

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  8. गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक
    गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है

    बहुत सही!

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  9. गुलामी जिस्म की रहती है जंजीर कटने तक
    गुलामी जेहन की बड़ी मुश्किल से जाती है |

    jay ho

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  10. बेहद उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं!

    आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

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  11. Vaseem saabah ne sach kaha hai ... jehan se gulaami jaldi nahi jaati ...

    vaise bhi angezon ke baad ham GANDHI parivaar ki gulaami kar rahe hain ... bhrash netaaon ki gulaami kar rahe hain ... hamen kya fark padhta hai ...

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  12. प्रवीण जी की बात को मेरी भी बात मानी जाय।

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  13. jawab nahi...bahut sundar aur bahut sahi bat kahi hai waseem sahab ne.....abhar dheeru ji bhaisahab...!!

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा