गुरुवार, सितंबर 25, 2008

आतंक, के अलावा और भी गम है ज़माने में

पहले बाढ़ फिर बम उससे पहले सिंगूर ,संसद में लूट ,नॉएडा यानि समाचार और चर्चाये करेंट टोपिक्स पर ही होती है । इन सब में महत्वपूर्ण मुद्दे जिनको जरुरत है ध्यान देने की पीछे छूट जाते है । और हम लोग एक ही मुद्दे के पीछे पड़ जाते है उसी पर टिपणी उसी पर कहानी उसी पर चर्चा उसी पर चिट्टा ।

आज कोई किसानो की बात नहीं कर रहा ,गरीबो की बात नहीं कर रहा ,गाँव की चर्चा में तो शायद बदबू आती है इसलिए यह तो पूरी तरह वर्जित । क्यों तथाकथित बुद्धिजीवी शबाना के घर के लिए चिंतित तो थे लेकिन गाँव,गरीब, किसान, झुग्गी झोपड़ी के इंसान के लिए उनकी रूचि नहीं दिखती ।

अनाज महंगा हो गया ,सब्जी महंगी हो गई ,दाले महंगी हो गई लेकिन कभी इसके पीछे यह देखा जो इनको पैदा कर रहा है उसकी लागत तो बढ गई लेकिन उसकी आमदनी तो घट गई । मुनाफा किसकी जेब में गया इस पर कोई चर्चा नहीं होती जो होनी चाहिए ।

अमीर और ज्यादा अमीर ,गरीब और ज्यादा गरीब होता जा रहा है । वह तो गरीबो की कोई फोर्ब्स मेगजीन नहीं है अगर होती तो पहले से आखिरी नंबर तक भारतीय ही होते । हम कंप्युटर पर उंगली चलाने वाले लोग सिर्फ एक ही ओर दौड़ लगाते है । कभी इस ओर भी ध्यान दें।

मुझे मालूम है बहुत लोग यह सब बकबास समझ कर इस को पढने में अपना समय जाया नहीं करेंगे । लेकिन एक बात मान लीजिये जब गरीब की हाय नहीं सुनी जाती तब क्रांति होती है ,ओर क्रांति की आग हम वातान्कुलित कमरों में बैठ कर खाली दिमाग दौडाने वाले को जायदा तपिश देगी ।

1 टिप्पणी:

  1. आप सही कह रहे हैं। गरीब की कोई नहीं सुनता। तब बहरे कानों को सुनाने के लिए कुछ करना पड़ता है। वही हुआ है नोएड़ा में।
    श्रम मंत्री ने सही बात कह कर सही बात कहने के लिए माफी मांग ली।

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा