सोमवार, जनवरी 19, 2009

हम बुद्ध नही बनेगे तुम को बुद्धू बनायेंगे

हे राजकुमार राहुल
यह आपको क्या हो गया
महलो मे रहने वाले आप
झोपडी से प्यार क्यो हो गया
क्या आपको सुख हड़ता है
या
सिद्धार्थ बुद्ध बनने की ओर बड़ता है
मेरी जिज्ञासा का समाधान करे
हे जन गन मन अधिनायक
कुछ तो छाया कोहरा साफ़ करे

युवराज राहुल पहले कुछ मुस्कराए
फिर धीरे से बुदबुदाये
हे दीन तुम अब भी नही समझ पाये
६० सालो मे दिया दर्द तुमने भूलाये
आज राज बचाने को यह प्रसंग जरूरी है
दीना नाथ तुम्हरी कुटिया मे आये
दीन को भरमाने के लिए जरूरी है
इससे कई कार्य सिद्ध हो जायेंगे
हमारे द्वारा बनाये गए गरीब
हमें अपने बीच पाकर
चुनाब तक अपने सारे शिकवे भूल जायेंगे
उनके वोटो से हम फिर सत्ता पा जायेंगे
उनके कष्टों का निवारण के लिए
हम फ़िर चार साल बाद आयेंगे
तब अपने महलो मे जम कर एश मनाएंगे
क्या तुम उल्टा सोचते
हम बुद्ध नही तुमको बुद्धू बनायेंगे

12 टिप्‍पणियां:

  1. "हम फ़िर चार साल बाद आयेंगे"

    प्रतीक्षा अलंकार का सुन्दर प्रयोग हुआ है !

    कवि ने अब जाकर अपने अन्दर के कवि को पहचाना है !

    बायें का सामान उठाकर दायें रख दिया ? यह क्या फेंगशुई है :)

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  2. @ भाई विवेक
    परिवर्तन है यह या नकल भी कह सकते हो .
    पता नही चलता लिखता जाता हूँ किसी धुन मे आप से पता चलता है यह तो कविता हो गई

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  3. सही लिखा है जी ..आगे आगे देखिये होता है क्या

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  4. बढ़ि‍या नीति‍कथन,व्‍यंग्‍य समेत।

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  5. खूब कहा भाई.....वैसे हम तो राहुल बाबा से उम्मीद लगाये बैठे है.....की उन घाघ बुढो से शायद उनकी रेटिंग थोडी सी ऊपर हो.

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  6. हम फ़िर चार साल बाद आयेंगे
    तब अपने महलो मे जम कर एश मनाएंगे
    क्या तुम उल्टा सोचते
    हम बुद्ध नही तुमको बुद्धू बनायेंगे
    " bhut sach likha agar jeet gye to sach mey janta ko buddu bna hi jayenge.."

    Regards

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  7. बहुत करार तमाचा है है ये आज की राजनीति पर...इतनी आसन सी बात को भी भोले भले वोटर नहीं समझ पाते....अब क्या कहें उन्हें? बहुत लाजवाब कविता है आपकी...
    नीरज

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  8. उनको देखने से आ जाती है चेहरों पे रौनक,
    वे समझते हैं कि वोट इसबार हमें ही मिलेगा !!!

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा