रविवार, जनवरी 03, 2010

खुशदीप जी गए छुट्टी पर - इसमें मक्खन क्या करे

नए साल में सूरज के दर्शन मुश्किल हो गए . ठण्ड ने कमाल कर दिया कभी कभी लगता है ठण्ड के मारे सूरज छुट्टी पर सुसराल चले गए . हां सुसराल से ध्यान आया बड़े बड़े सूरमा छुट्टियों पर सुसराल जाते है राज़ी से नहीं तो .......... तो क्या जिन्दगी हराम कर ले ना करके ........ खैर सुसराल है ही स्वर्ग की सार 


सुसराल की बात चली तो सुसराल वकेशन मनाने हमारे शहर एक ब्लागर भाई खुशदीप सहगल आज कल आये  है  . इसीलिए देशनामा छुट्टी पर है और स्लाग ओवर बंद और मक्खन ........ मक्खन भी गया सुसराल मक्खनी के साथ . खैर अब आगे 


एक फोन काल आई मैं खुशदीप सहगल बरेली में . वाह वाह क्या बात हुई तो मिलने का प्रोग्राम तय हो गया . ठीक समय पर खुशदीप भाई आये हमारे घर . कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते रहे . कितने सुंदर व्यक्तित्व पता नहीं क्यों कम्प्यूटर और कलम तोड़ी १५ साल अगर माडल होते तो सुपर . 


इतने जिम्मेदार पोस्ट पर कार्यरत खुशदीप भाई कितने सरल है उनसे दो मिनट बात करके ही पता चल जाता है . एक पत्रकार होने के कारण भारत के बिगड़े सिस्टम से दुखी खुशदीप भाई कुछ करना चाहते है और युवा सोच ही इस देश का कल्याण कर सकती है ऐसा मानना है उनका . मेरे पिता जी से एक लम्बी चर्चा हुई दुनिया जहान की बाते हुई और परिवार की भी . 


उनके द्वारा कुछ टिप्स भी मिले ब्लॉग पर लिखने के लिए . समय कितनी जल्दी  बीत रहा था पता ही नहीं चला . समय की अपनी मर्यादा होती है और ना चाहते हुए भी मुलाक़ात का वक्त ख़त्म करना पड़ा . पहली बार किसी ब्लॉगर से रूबरू हुआ था तो एक खुशी भी थी मुझे और परिवार को भी 


और आखिरी बात पहली बार कोई मेरी पहचान से मेरे घर आया . 


स्लाग ओवर 


मक्खन सुसराल गया वहां मक्खनी से पूछा अब तो खुश हो .....


मक्खनी क्या बोली ..........................


फिर कभी ....................



8 टिप्‍पणियां:

  1. खुशदीप जी से मुलाकात करना बहुत अच्छा लगा। कुछ चित्र होते तो सोने में सुहागा हो लेता।
    खुशदीप यथा नाम तथा गुण हैं, वे खुशियों के दीप जलाते चलते हैं।

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  2. हिन्दी ब्लागिंग में चाहे आपस में जितनी भी सिरफुटौव्वल हो लेकिन एक बात तो माननी पडेगी कि इसने आपस में एक अजीब सी आत्मीयता का संचार जरूर किया है।

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  3. कितने सुंदर व्यक्तित्व पता नहीं क्यों कम्प्यूटर और कलम तोड़ी 15 साल अगर माडल होते तो सुपर

    घनघोरता से सहमत :-)

    पहली बार कोई मेरी पहचान से मेरे घर आया

    कितनी गहरी बात को आप सहजता से कह गए

    बी एस पाबला

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  4. खुशदीप भाई जहाँ पहुँच जाएँ...खुशी अपने आप ही पीछे-पीछे पहुँच जाती है

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  5. बहुत सुंदर लगे आप के शव्द, बहुत अपना पन लिये ब्लांग जगत जिंदा वाद कहेगे हम तो

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  6. वाह भाई, मज़ा आ गया ये पोस्ट पढ़ कर। यूं ही कोसते हैं खुद को।
    आप तो हीरा पन्ना हैं। कभी अपनों से पूछ कर देखा है?

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  7. धीरू भाई,
    आज ही बरेली से नोएडा वापस आया हूं...अपनी ताजा पोस्ट के लिए आपके लिंक की ज़रूरत थी...आपके लिंक पर आया तो इस पोस्ट पर नज़र पड़ी...आपने जो मान दिया, उसका आभार जताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है...आपके साथ बरेली में जितना भी वक्त बीता, यादगार बन गया है...आपसे मुलाकात के साथ बाबूजी से भी बात करना मेरे लिए बोनस की तरह रहा...लेकिन धीरू भाई, आपकी पहचान आपकी अपनी है...ये ठीक है सूरज के साथ रहते-रहते चांद की रौशनी कम दिखाई देती है...लेकिन सृष्टि को चलाने के लिए चांद की भी उतनी ही अहमियत है जितनी कि सूरज की...

    जय हिंद...

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  8. ..व्यक्तित्व पता नहीं क्यों कम्प्यूटर और कलम तोड़ी १५ साल अगर माडल होते तो

    sahi kaha dhiru ji.... Khusdep ji ko aksar kahta hu mante hi nahi....

    akhir kia kar rahe he yaha......jawab bhi nahi dete...

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा