शनिवार, जनवरी 16, 2010

लगाकर आग दौलत में हमने यह खेल खेला है - हम कहते है ब्लॉग और घर वाले कहते झमेला है

सच में ब्लोगिंग बहुत खर्चीली लग रही है .पहले तो चूहे भगाने वाली कम्पनी के इंटरनेट कैफे का मेंबर बना २५०० जमा करके ५००० रु मिलने का वादा मिला लेकिन बाप का सपना सारा माल अपना . बताया गया आपका टाइम लेप्स हो गया और पैसा भी .फिर कमर कसी सरकारी ब्रोड बैंड लगवाया घर पर २५० रु का प्लान जो पहले महीने १५०० रु हो गया फिर सयानो की मानी अन लिमिटेड प्लान लिया अब ७५० रु महीना टैक्स अलग भुगत रहे है .

अब ब्लोगिंग चालु हो गई बेधड़क .धडाधड . अच्छे अच्छे लोग दोस्त बने दुनिया के कोने कोने में . फ़ोन भी आने लगे और दोस्त भी . एक परिवार भी मिला शुभचिंतक भी . रोज़ वक्त जो जाया होता था अब जाया नहीं होता . ख़ैर यह बाते तो चलती रहती है बात तो अभी खर्चे की चल रही है . अब मै अपने को स्थापित मान बैठा . डेस्क टॉप जरा लेबिल से नीचे महसूस होने लगा जुगत भिडाने लगा कैसे भी लेप टॉप की जुगाड़ तो होनी ही चाहिए . और एक कैमरा भी आखिर फोटो से सजी पोस्ट ज्यादा सुंदर लगेगी . ..

यह सब हथियार ऐसे लगने लगे इससे में टक्कर ले सकूंगा सर्व श्री इनसे उनसे और उनसे और उनसे ................................  अरे यह तो अपने है मै तो ब्लॉग लिख रहे बड़े भैय्या और जल्दी शुरू हुए छोटे भईय्या से टक्कर लेने की सोचने लगा . सारा ध्यान लैप टॉप पर देने लगा . अपने अन्न दाता को मनाया गुहार मनुहार जो हो सकता है सब तीर निशाने पर साधे . बार खाली ना जाए पेशबंदी शुरू कर दी . डेस्क टॉप पर बैठो तो ठण्ड लगती है ,मच्छर लगते है . गर्मी लगती है .हमारे यहाँ बिजली आती कम है जाती ज्यादा है और इसलिए बैटरी बैकप से काम चल जाया करेगा .

 सारी दलील और गवाही को  मद्देनज़र रखते हुए अन्नदाता ने एक लेपटोप स्वीकृत किया साथ में स्केनर और कलर प्रिंटर भी . लगभग आधा लाख खर्च कर प्रगतिशील ब्लोगरो में से एक दरबार वाले धीरू सिंह कहाँ होंगे यह तो वक्त तय करेगा फिलहाल -


लगाकर आग दौलत में हमने यह खेल खेला है 
हम कहते है ब्लॉग और घर वाले कहते झमेला है 

15 टिप्‍पणियां:

  1. पोल खोल के धर दी धीरु भाई आपने
    कुछ तो छिपा लिया करो। ऐसे लगता
    है इस पोस्ट मे हम ही बोल रहे हैं।:)

    उत्तर देंहटाएं
  2. अद्भुत। ललित शर्मा जी से एक मत।

    उत्तर देंहटाएं
  3. घर वाले कहते झमेला है अजी घर वाले सच कहते है

    उत्तर देंहटाएं
  4. चलिए यह शुरूआती बाधाएं तो दूर हुईं, बधाई! अब शुरू हो जाइए - कम से कम पांच पोस्ट हर हफ्ते की, बरेली के चित्रों के साथ.

    उत्तर देंहटाएं
  5. धीरू भाई सत्यवचन,
    ललित भाई की बात को ही मेरा दर्द भी समझिए...वैसे मेरे दर्द को आप इसलिए भी अच्छी तरह जान सकते हैं क्योंकि मेरी होम मिनिस्टर बरेली से ही हैं...और बरेली वाले कैसे होते हैं, ये आपसे बेहतर और कौन जान सकता है...

    जय हिंद....

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह लेपटोप स्केनर प्रिंटर ! मुबारक हो जी |
    अब ब्लोगिंग के लिए पूरी तरह से लैस हो गए है |
    अन्नदाता का हमारी और से भी आभार |

    उत्तर देंहटाएं
  7. .
    .
    .
    लगाकर आग दौलत में हमने यह खेल खेला है
    हम कहते है ब्लॉग और घर वाले कहते झमेला है।


    सत्यवचन! धीरू सिंह जी,
    यही हाल अपना है, मुझे तो अपने अन्नदाता से रोज संघर्ष करना होता है लैप टॉप को अपनी लैप पर १-२ घन्टे रखने के लिये, कारण वही, वे सोचती हैं कि ब्लॉगिंग फिजूल का झमेला है।...

    उत्तर देंहटाएं
  8. जो घर वाली कहे उसी को सच मानिए ..... इसमे ही भलाई है ......

    उत्तर देंहटाएं
  9. home ministry kee sunenge to bhalayi mein rahenge [;)]... achha likhte hai aap... sikhne ko bahut kuchh mila...

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या धीरूभाई एक टिप्पणी के लिये तीन बार चटखा लगाया तब जाकर यहां पहुंची हूं । बहर हाल साजो-सामान का तो बढिया जुगाड हो गया । अब तो पोस्टें ही पोस्टें । इंतजार है ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. अरे वाह, नया लैपटाप, नया प्रिन्टर, नया स्कैनर! बढिया है.

    उत्तर देंहटाएं
  12. धीरू भैया, जैसी अच्छी पर्सनल्टी, वैसी अच्छी पोस्ट। झमेला होगा तो होगा ही, आप तो खेलो खुल्लमखुल्ला। और बडे भाई, प्रगतिशील ब्लागर तक तो ठीक है, आगे कहीं तथाकथित प्रगतिशील लेखक, विचारक, आलोचक आदि बनने का विचार तो नहीं है, पहले से ही बहुत हैं

    उत्तर देंहटाएं

आप बताये क्या मैने ठीक लिखा