शुक्रवार, जनवरी 15, 2010

पांच करोड़ महामूर्खो का महाकुम्भ लिखने वालो कभी महामूर्खो का हज लिख कर देखना

5 करोड़ महामूर्खो का महा कुम्भ  यह कहना है नव भारत टाइम्स के ब्लॉग में बारामासा लिखने वाले कोई राकेश परमार का . कितना लिखा है और क्या लिखा है कमाल है . हिन्दू आस्था के साथ इतने प्यार से किया गया बलात्कार हमें स्वीकार्य है वह भी एक तथाकथित हिन्दू द्वारा . परमार साहब में हिम्मत है तो कभी करोडो महामूर्खो का हज जैसा लिखे . क्यों हज पर जाते है हजारो किलोमीटर चल कर यह महामूर्ख , जम जम की जगह मिनरल वाटर लाये और जो करना है अपने घर पर करे . तो उन्हें ज्ञात हो जाएगा वह कहा गलती करते है


इतना लिखे तो उन्हें पता चल जाएगा कौम क्या होती है . और अनर्गल लिखने का क्या हश्र होता है . भाई परमार आपने जो लिखा शायद वह आपको संस्कार में नहीं मिला होगा . जब आप पैदा हुए होंगे तो आपके परिवार ने खुशियाँ मनाई होंगी और निश्चित ही नामकरण संस्कार करके पहला मूर्खतापूर्ण कदम उठाया होगा . कितनी बार ऐसे कदम उठे होंगे इनका प्रायश्चित कीजिये .



यह जो फैशन चल गया है हिन्दुओ का माखौल ,उसे बंद होना चाहिए . इतिहास गवाह है जब जब कौमों की मज़ाक उडाई जाती है तब तब खालिस्तानी  या तालिबानी  तैयार हो जाते है . और हिन्दू इतने मुरदार नहीं जो सब सह जाए . सहनशीलता की भी सीमा होती है अगर ना तोडी जाए तो अच्छा . 


अगर मै सही हूँ तो बताये अगर गलत हो तो तब भी . 


बोलने या लिखने की आज़ादी का मतलब यह नहीं कि भावनाओं के साथ खेला जाए 







21 टिप्‍पणियां:

  1. उस परमार नामक गधे से पूछिये कि उसे कितना पैसा मिला यह लिखने के लिये?

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  2. परमार जैसे बेवकूफों की सोच इससे आगे जा ही नहीं सकती पांच करोड़ लोगों की आस्था को एक आला दर्जे का महामूर्ख ही अपने समान कह सकता है विवेकवान व्यक्ति नहीं

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  3. बहुत सही लिखा आपके...यह जो फैशन चल गया है हिन्दुओ का माखौल ,उसे बंद होना चाहिए . एकदम सटीक!!

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  4. ये परमार जैसे बेवकूफ़ लोग हैं तो हमें किसी दुश्मन की कौन जरुरत है।

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  5. ये आजादी , ये स्‍वतंत्रता तो हमारे धर्म ने ही हमें दी है .. प्रगतिशीलता तो इसी का नाम है .. और इसी के माध्‍यम से तो हम युग के अनुरूप अपने धर्म का निर्माण कर सके हैं .. आज जो उचित नहीं दिखता .. वो काम हमारे देश मे क्‍यूं हो ??

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  6. सच मै यह एक महा मुर्ख ही है, जिसे ना बोलने का ना लिखने का ढंग है, मै तो हेरान हुं इन ने हिन्दी मै केसे लिख दिया? ओर फ़ॊटू भी पता नही अपने विचारो के हिसाब से कहा से ढुढ लाया,
    आप के लेख से सहमत है धीरु भाई, भुळ जाओ इस बेवकुफ़ को

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  7. धीरु भैया, इनका क्सूर नहीं है कसूर इस धरती का है। भारत एक आजाद देश है, हां, सबसे बडी आजादी बोलने की और लिखने की है बशर्ते हिंदू, हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तानी सभ्यता के खिलाफ कुछ कहना हो। जिस देश में रह रहे हो, जिस धर्म में जन्म हुआ उसी को गाली देने से ही तो आधुनिक या प्रगतिशील कहलायेंगे। इसी महान पत्र-समूह के अंग्रेजी संस्करण(दिल्ली) में कुछ साल पूर्व पहले पेज पर एक कालम किसी घटना विशेष के डेली अपडेट के लिये मार्क कर दिया गया था, जानते हैं वह घटना क्या थी? माननीया., आदरणीया, सौभाग्यवती श्रीमती सोरी मिसेज.............. अपनी पहली डिलीवरी के लिये अस्पताल में भर्ती हुईं थी। अपना पत्रकारिता धर्म निभाने के लिये और अति समझदार लोगों का सामान्य ग्यान पैना करने के लिये इतना बडा त्याग करने वालों को कुंभ मेले जैसे अवसर पर ऐसी टिप्पणी ही सोहती है। अरे भैया, तुम मत बनो महामूर्ख, हम भी नहीं जा रहे लेकिन जो जा रहे हैं, अपनी समझ से, अपनी श्रदधा से, खुद कष्ट उठाकर जा रहे हैं तुम प्रमाणपत्र देने वाले कौन? तेली का तेल जले, मशालची .......

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  8. रघुपति राघव, राजा राम,
    सबको सम्मति दे भगवान...

    जय हिंद...

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  9. aap ke vachhan satay hain. parmar sahab ko pahle apne maa baap ko murkh kahna chahiye jo unohne uska namkaran kiya. sidha sidha ek number de dena chahiye tha 100 cr. ke abadi me

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  10. मैं नदी स्नान से स्वयं दूर रहने की कोशिश करता हूँ (कारण सामाजिक और वैज्ञानिक हो सकते हैं)... लेकिन परंपरा में आस्था है और क्यूँ न हो ये हमारी गौरवशाली पूंजी है...

    परमार जैसे कुसंस्कारी और गैरजिम्मेदार लेखक, लेखन में शोर्ट कट अपना रहे हैं...
    न भाषा की तमीज है न लेखन का तरतीब. (क्या कीजियेगा हिन्दू माफ़ करने वाली कौम है..)

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  11. ऐसा ही है. हिन्दू %‍%%%‍॒॒॓॑॑॓॓)()ऽ* ही है. जूते खाता है और तमाशा देखता है. एक और गुलामी की ओर अग्रसर.

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  12. कायर सेकुलर जमात के लिए एक अलग से ब्लॉग बनाया जाना चाहिए जिस पर इस तरह के लेखों का लिंक हो और लोग टिप्पणी में सिर्फ थूकें - "थू"।

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  13. धीरूजी , नवभारत टाइम्स अपनी ज़िन्दगी के आखरी क्षण गिन रहा है । सम्पादक महोदय उसे संभाल नहीं पा रहे हैं, इसलिए जानबूझ कर ऐसा कचरा छापने की कोशिश कर रहें हैं जिससे चर्चा हो सके और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष सरकार के ज़्यादा से ज़्यादा विज्ञापन ले सकें....आप चिंता न करें उन्हें दम तोडता हुआ देखिए... ये परमार सम्पादकजी के कोई परमयार ही पाए जाएंगे ।

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  14. यह अतिवादी लेखन है। किसी आस्था को मानने वाले को मूर्ख कहना स्वयं में मूर्खता है। आलोचना की अपनी सीमा होती है।

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  15. नभाटा का यह मूर्ख बड़ा प्रसन्न होगा कि उसे मूर्ख शिरोमणि की उपाधि देने वाले बहुत हैं!
    गंगा की बदहाली के लिये आस्थावान भी बहुत जिम्मेदार हैं। पर उन्हे मूर्ख तो वह कहे जिसने गंगा शुद्धिकरण के लिये कुछ सार्थक किया हो!

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  16. सच का भी एक समय और स्थान होता है। मैंने वह पोस्ट नहीं पढी है किंतु आपकी बौखलाहट से उसका अनुमान लगा सकता हूं। हिन्दू ही क्यूं गेलीलिओ को अन्धा कर देने वाले भी ध्रमान्ध ही थे भले ही दुनिया गोल हो और सूरज के चारों ओर ही चक्कर लगाती हो किंतु समझदारी इसी में है कि पागलखाने में जाकर पागलों को पागल मत कहो भले ही वे हज़ वाले हों या कुम्भ वाले। बुद्धिजीवियों की बात बुद्धिजीवियों के बीच ही करना चाहिये। बुन्देलखण्डी में एक कहावत है-
    ज्ञानी मारे ज्ञान सौं, सो रोम रोम भिद जाये
    मूरख मारे डेंड़का, सो कनफट्टा फट जाये
    बेहतर होता कि लोग इस आस्था को अपने कौशल से नदी सफाई अभियान की ओर बदलने की कोशिश करते जैसे आनन्दपुर साहब में परसाद के रूप में एक पौधा दिया गया था जिससे लाखों पेड़ लगे होंगे।
    @पता नहीं सुरेश को हर असहमति में पैसे का खयाल क्यों आता है और ये पैसा कहाँ पर कौन बाँटता है, जिसकी जानकारी क्वएवल उन्हें है और यदि ऐसा है तो उसे सप्रमाण उजागर करें।

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा