आज बहुत दिनों बाद इस गली आना हुआ . लगा जैसे उन गलियों में पहुँच गए जहाँ बचपन बिताया . आज भी सब याद आ रहा है सब वह लोग याद आ रहे है जिन से प्रेरित होकर लिखना सीखा . कोशिश करूँगा रोज घुमने आऊ . मन बनाया है तो आऊंगा भी रोज . तब तक इंतजार
सोमवार, जुलाई 22, 2019
रविवार, जुलाई 30, 2017
दिल्ली दरबार
दिल्ली दरबार
इंग्लैंड का किंग जार्ज पंचम ने जब १९११में दिल्ली में अपना दरबार लगाया उस समय के तमाम राज्यों के राजाओं नबाबो ने सिर झुका कर स्वागत किया और किंग जार्ज को भरोसा हुआ अगली कई शताब्दियों तक ब्रितानी हुकूमत चलती रहेगी।
लेकिन जनता ख़िलाफ़ थी और तीस सालो के अंदर ही आम जनता ने अंग्रेजो को भारत से भगा दिया।
इतिहास बहुत कठोर होता है और भविष्य बहुत निर्दयी। राज्यों के राजा नवाब की चरण वंदना से यह नही लगना चाहिए प्रजा ख़ुश है।
अति आत्मविश्वास की पराकाष्ठा और अहंकार में बहुत महीन अंतर होता है। और अहंकार तो रावण का भी नही बचा।
शेष शुभ
इंग्लैंड का किंग जार्ज पंचम ने जब १९११में दिल्ली में अपना दरबार लगाया उस समय के तमाम राज्यों के राजाओं नबाबो ने सिर झुका कर स्वागत किया और किंग जार्ज को भरोसा हुआ अगली कई शताब्दियों तक ब्रितानी हुकूमत चलती रहेगी।
लेकिन जनता ख़िलाफ़ थी और तीस सालो के अंदर ही आम जनता ने अंग्रेजो को भारत से भगा दिया।
इतिहास बहुत कठोर होता है और भविष्य बहुत निर्दयी। राज्यों के राजा नवाब की चरण वंदना से यह नही लगना चाहिए प्रजा ख़ुश है।
अति आत्मविश्वास की पराकाष्ठा और अहंकार में बहुत महीन अंतर होता है। और अहंकार तो रावण का भी नही बचा।
शेष शुभ
मंगलवार, जुलाई 11, 2017
एक कहानी जो न होगी पुरानी
किसी समय किसी शहर में एक बनिया दुकान चलाता था उसकी दुकान पर एक गाँव वाला आता था जो अपने पास तलवार रखता था। बनिए ने पूछा इस तलवार से क्या होता है
जवाब मिला अगर कोई लूटने आए तो उसे काट देगी यह तलवार
वाह बढ़िया चीज़ है कितने में बेचोगे। सौदा हुआ और बनिए ने वह तलवार ख़रीद ली और घर पर ले जाकर टाँग दी।
कुछ दिनो के बाद बनिये के घर डकैत आए और लूटने लगे बनिया एक कोने से तलवार से कहने लगा उतर निकल काट दे मार दे। लेकिन कुछ नही हुआ लूटा पिटा बनिया ग़ुस्से में आया और तलवार पर लात मारी। लात मारते ही उसका पैर कट गया उसे देख कर बोला जिस काम को लाए तब तो कुछ नही किया अब हम पर ही चोट पहुँचा रही हो
लब्बोलुआब यह है हथियार ख़रीदने से कुछ नही होता उसे चलाने का जिगर भी होना चाहिए
डिस्क्लेमर :- यह एक कहानी है इसका किसी ज़िंदा या मुर्दा से कोई सम्बंध नही है। अगर आप इसे किसी से जोड़ते हो तो यह आपकी कल्पना की उड़ान है।
गुरुवार, जुलाई 06, 2017
हम नक्कारख़ाने में तूति बजाते है लिखते है और लिखकर भूल जाते है
जो हो रहा है वह सही नही हो रहा है । विरोध एक व्यक्ति का लेकिन विरोध के समय हर मर्यादा का हनन हो रहा है । एक राष्ट्र प्रमुख देश के लिए देश के हित के लिए रात दिन अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है और हम कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए उसकी निंदा करते समय देश के बारे में भी अनर्गल बातें करते है ।
यह हमारी संस्कृति नही लेकिन दोषी एक पक्ष ही नही । अनर्गल प्रलाप दोनों पक्षों के तरफ़ से हुआ है मर्यादाए दोनों तरफ़ से टूटी है लेकिन आपसी द्वन्द से देश को नुक़सान हो रहा है देश के मनोबल पर असर पड़ रहा है । हम वर्तमान में नही भविष्य के लिए लड़ रहे है । हम से तात्पर्य हमारे उन लोगों से है जो देश को चलाना चाहते है ।
आपसी लड़ाईं में देश न हार जाए इसका ध्यान रखे ।
हम नक्कारख़ाने में तूति बजाते है लिखते है और लिखकर भूल जाते है
शुक्रवार, जून 30, 2017
अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस शुभकामनाये स्वागत
एक बार फिर से ब्लाग लिखने के मुहिम चालू करने के लिए ब्लॉग दिवस बहाना मिला है । ब्लॉग लिखते पढ़ते दुनिया के तमाम लोगों से परिचय हुआ सम्बंध बना लेकिन सुविधाजीवी स्वभाव के कारण ब्लॉग की जगह सोशल मीडिया पर हम लोग शिफ़्ट हो गए । कुछ लोग ब्लॉग पर ही केंद्रित रहे और उनके लेख पढने के लिए कभी कभी ब्लॉग में झाकने आ जाते थे .
रोज़ रोज़ जो मन में आया वह फेसबुक में लिख दिया यह प्लेटफार्म भी अजीब है लोगो के हजारो फ्रेंड है लेकिन १०% भी यह देखने नही आते की फ्रेंड क्या कर रहा है . मेरे फेसबुक फ्रेंड में अधिकांश आभासी मित्र ब्लॉग के साथी ही है .
खैर अब कोशिश की है अपना दरबार रोज़ खोला जाए इसके लिए अपने आई पेड में ब्लोगर ऐप को डाउनलोड कर लिया है और फोन में भी
ब्लॉग लिखने की आदत छुट गई वह तो भला हो गूगल की एक आईडी से ब्लॉग खुल जाता है वरना यह भी भूल जाते की ब्लॉग कहाँ है .
ब्लॉग दिवस के अवसर पर सभी मित्रो से अनुरोध है ब्लॉगवाणी या चिट्ठाचर्चा फिर से शुरू किये जाने का प्रयास किया जाए .
ब्लॉग दिवस की हार्दिक शुभकामनाये .
आओ फिर से साथ चले
२००८ से २०१७ तक का मेरा सफर अच्छे दिन की ओर है
रोज़ रोज़ जो मन में आया वह फेसबुक में लिख दिया यह प्लेटफार्म भी अजीब है लोगो के हजारो फ्रेंड है लेकिन १०% भी यह देखने नही आते की फ्रेंड क्या कर रहा है . मेरे फेसबुक फ्रेंड में अधिकांश आभासी मित्र ब्लॉग के साथी ही है .
खैर अब कोशिश की है अपना दरबार रोज़ खोला जाए इसके लिए अपने आई पेड में ब्लोगर ऐप को डाउनलोड कर लिया है और फोन में भी
ब्लॉग लिखने की आदत छुट गई वह तो भला हो गूगल की एक आईडी से ब्लॉग खुल जाता है वरना यह भी भूल जाते की ब्लॉग कहाँ है .
ब्लॉग दिवस के अवसर पर सभी मित्रो से अनुरोध है ब्लॉगवाणी या चिट्ठाचर्चा फिर से शुरू किये जाने का प्रयास किया जाए .
ब्लॉग दिवस की हार्दिक शुभकामनाये .
आओ फिर से साथ चले
२००८ से २०१७ तक का मेरा सफर अच्छे दिन की ओर है
गुरुवार, जून 29, 2017
गुरुवार, अप्रैल 07, 2016
अब और नहीं - अब और नहीं
बहुत हुआ
बहुत सहा
अब और नहीं
अब और नहीं
समय आ गया
बन दावानल
प्रचण्ड आक्रमण
अब यही सही
अब यही सही
रौद्र रूप से उठो
ज्वालामुखी से तपो
अस्मिता का प्रश्न है
अब आगे बढ़ो
अब आगे बढ़ो
बहुत सहा
अब और नहीं
अब और नहीं
समय आ गया
बन दावानल
प्रचण्ड आक्रमण
अब यही सही
अब यही सही
रौद्र रूप से उठो
ज्वालामुखी से तपो
अस्मिता का प्रश्न है
अब आगे बढ़ो
अब आगे बढ़ो
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