गुरुवार, जुलाई 01, 2010

और वह फाँसी चढ़ गया ............ आखिर उसे अपनी करनी की सज़ा मिली


वह पूरी जेल में लोकप्रिय था . पूजा पाठी ,कर्मकांडी सब से हँस के ही मिलता था . लोग चकित होते थे वह जेल में क्यों है .कोई नहीं मानता था वह अपराधी हो भी सकता है . उसे क़त्ल के जुर्म में फाँसी की सज़ा हो चुकी थी . और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर मोहर लगा दी थी . राष्ट्रपति से  क्षमा दान के लिए अपील थी इसीलिये वह आम कैदियों के साथ ही रहता था .

सब उसे पंडित जी कह कर बुलाते थे . वह अपने अतीत के अलावा सब बात करता था . बात लगभग ३० साल पुरानी है . पंडित के व्यवहार को देखते हुए उसे तत्कालीन राजनेतिक बन्दियो के साथ जो आपातकाल में जेलों में थे उनके साथ सेवा के लिए रख दिया . पंडित पक्का कैदी था पका मतलब सज़ा याफता . पीले कपड़ो में जब वह भजन गाता था तो उसके चेहरे पर एक ओज सा आ जाता था . राजनेतिक बंदी भी यह मानने लगे थे उसे किसी षड्यंत्र के तहत फसा कर उसे फाँसी के तख्ते पर पहुचा दिया गया है . वक्त के मारे राजनेतिक बन्दियो को उससे हमदर्दी हो गई थी . उसकी मदद के लिए कोशिशे शुरू हो गई . लेकिन तब तक देर हो चुकी थी .

राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका ठुकरा दी . उसकी मौत का दिन मुकर्रर हो गया . फांसी के अपराधी को तन्हाई में रखने के आदेश हो जाते है आज वह आखिरी बार सब कैदियों से मिल रहा था सब उसकी किस्मत पर दुखी थे . एक निरपराध से दिखने वाले  को मौत के मूंह में जाते देख सब को दुःख हो रहा था . तभी एक साथी कैदी ने इन्साफ के खिलाफ ईश्वर को दोषी ठहराया तभी पंडित ने कहा उसके साथ कोई अन्याय नहीं हुआ उसे अपनी करनी की सज़ा मिली है उसने जो अपराध किया उसके लिए तो फाँसी भी सज़ा के तौर पर कम है . यह कह वह हलके हलके तन्हाई की ओर चला गया कभी भी ना लौटने के लिए .

कुछ दिन बाद ही एक सुबह उसे फांसी दे दी गई . कोई उसकी लाश तक लेने नहीं आया क्योकि किसी बात पर उसने अपने पूरे परिवार को मार दिया था .

12 टिप्‍पणियां:

  1. इन्सानी फितरत का कोई ठिकाना नहीं..

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  2. व्यक्ति आक्रोश मे अपना होश खो बैठता है। उसे मालूम था कि उसके द्वारा किया गया अपराध कितना संगीन है। प्रायश्चित के लिये इस सजा को भी वह कम इसीलिये आंक रहा था। जघन्य हत्या का कृत्य!

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  3. इसीलिए वेदों ने कहा है कि "मनुर्भव:"

    इंसान के हैवान बनने के बीच थोड़ा सा ही फ़ासला है।

    बाद भले ही पश्चाताप करना पड़े।

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  4. मार्मिक कथानक । क्रोध की तत्क्षणता व तीक्ष्णता पूरे जीवन को ले डूबती है ।

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  5. एक आदमी के कई रूप, कई चेहरे होते हैं। परिस्थितियाँ पता नहीं किससे क्या करवा दें।

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  6. ना जाने ऐसे हालात क्यों बन जाते हैं

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  7. मार्मिक कथानक है.
    व्यक्ति कभी-कभी आक्रोश में कुछ त्रुटियाँ कर जाता है जो कि अक्षम्य हो जाती हैं, पर कभी-कभी परिस्थितियाँ ऐसी आ ही जाती हैं कि उसे दो गलत या दो सही कार्यों में से एक को चुनना ही पड़ता है.
    जैसे भगवान श्रीराम ने वंश-परम्परा के सम्मान और मर्यादा की रक्षा हेतु सीता माता का परित्याग कर दिया.
    सही किया पर नारी के सम्मान को तो कलंकित किया ही न !!
    तभी तो पत्नी-वियोग मिला उन्हें !!
    अतः कभी-कभी कुछ..........

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  8. आक्रोश या मजबूरी के तहत किया गया अपराध फाँसी की श्रेणी में आना चाहिए ... पता नही पर ऊपर वाला तो हिसाब रख ही रहा है ...

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा