बुधवार, सितंबर 14, 2011

आज हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध है



आज हिन्दी का वार्षिक श्राद्ध है . तमात विज्ञापन छपे है हिंदी को याद करने के लिए अखबारों में . तभी याद आया हिंदी डे का . आज से हिन्दी की सेवा के लिए पखवाड़े मनाये जायेंगे . बेंको ,सरकारी आफिसो में हिन्दी की सहानुभूति के जो पट लगे है वह साफ़ किये जायेंगे जिन पर लिखा होता है हम हिन्दी में लिखे पत्रों को स्वीकार करते है . 

आज हिन्दी के बेचारे लेखको को खोज खोज  कर उनको अंगवस्त्र व् श्री फल के उपहार दिए जायेंगे . उनकी रचनाओं को जो शायद पढी भी ना हो प्रशंसित की जायेंगी . 

 मुझे यह सब उसी तरह लगता है जैसे हम अपने  पितरो का श्राद्ध करते है .

 हिन्दी की दुर्दशा के दोषी कौन है अगर खोज की जाए तो हम सब दोषी ही साबित होंगे . ६२ साल हो गए हिन्दी दिवस मानते हुए लेकिन आज भी कृषि ,विज्ञानं के शोध अंगरेजी में ही होते है जबकि उनका फायदा तभी हो सकता है जब वह हिंदी ,तमिल ,तेलगू ,कन्नड़ ,बंगाली ,मराठी ,असामी ,पंजाबी,गुजराती आदि में हो क्योकि हम यही भाषाए जानते है अंगरेजी नहीं .

खैर लेट्स सैलीव्रेट हिंदी डे  


11 टिप्‍पणियां:

  1. अगर हिन्दी बोलने वालों का बाजार इतना बड़ा न होता तो कब की निपटा चुके होते.

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  2. @हिन्दी की दुर्दशा के दोषी कौन है अगर खोज की जाए तो हम सब दोषी ही साबित होंगे.

    सहमत हूँ आपसे.........

    हिंदी दिवस पर सादर शुभकामनायें..

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  3. इस बहाने सरकारी प्रतिष्ठान हिन्दी को याद तो कर लेते हैं, वरना ...

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  4. जै हिन्‍दी, जै ब्‍लॉगिंग और साथ साथ जै हो आपकी !

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  5. नहीं जी जन्मदिन कहो, हिन्दी का सम्मान बढाओ।

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  6. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है कृपया पधारें
    चर्चामंच-638, चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  7. शीर्षक पढ़ा तो स्तब्ध रह गया ... फिर सोचा तो लगा इससे बेहतर शीर्षक नहीं देखा अभी तक ब्लॉग जगत में हिंदी दिवस के लिए ...

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  8. एकदम सहमत। अपन तो आज से सत्रह साल पहले 14 सितंबर को अपने संस्थान में ऐसे ही विचार प्रकट करके नकारात्मक, आलोचक आदि आदि प्रशस्तियाँ पा चुके:)
    सही कहा है भारतीय नागरिक ने, अगर एक बड़ा वर्ग हिन्दी को जानने वाला न होता तो कब की निपट गई होती ये। हिन्दी मौजूद है तो अपनी असली ताकत के कारण, जन जन की भाषा होने के कारण, न कि सरकारी दिवस आयोजित किये जाने के कारण।

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  9. बहुत सही कहा आपने ..बिलकुल सहमत हूँ आपसे ..परन्तु आज इस दुर्दशा के पीछे हमारा भी ही उतना योगदान है

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा