शुक्रवार, जून 18, 2010

मुन्ना लाल ....... वह एक कहानी का पात्र नही था . लेकिन कहानी हो गया

दुनिया भर का सामान अपने और गम अपने कंधो पर ढोता था .भिखारी  सा दिखता था लेकिन भीख मांगते किसी ने नहीं देखा . खिचडी बाल बड़ी हुई दाड़ी और खामोशी ओडे दरबदर घूमता रहता था . दो ईट रख बना लिया चुल्हा और एक भगोने में जो मन आया पकाया और खाया . यही दिनचर्या  थी उसकी . लोग उसे मुन्नालाल नाम से जानते थे .

मुन्नालाल को आते जाते कुछ लोग चिडाते थे तो खामोश सा रहने वाला मुन्नालाल फट जाता था दुनिया भर की तमाम गालियाँ बकने लगता था . उसका रोद्र रूप देखकर बच्चे डर जाया करते थे जिसमे से मैं भी एक था . मुन्नालाल के बारे में लोग तरह तरह की बाते करते थे . कोई कहता था वह सरकारी नौकरी में था उसकी बीबी बच्चा मर गया तो वह पागल हो गया और घर बार छोड़ सड़क पर रहने लगा . लेकिन मैंने उसे कभी पागलो की तरह व्यवहार करते नहीं देखा . सिर्फ एक बार वह मेरे घर आया और खाने को सब्जी माँगी . उसके बाद उसने कभी कुछ नहीं माँगा . मुन्नालाल को देखते देखते मैं बड़ा हो रहा था . और मेरे देखते देखते मुन्नालाल बूढ़ा हो रहा था .

किद्ववन्तियों  से घिरा मुन्नालाल  कब लाश में बदल गया पता  जब चला जब कई घंटो तक हलचल नहीं हुई . लावारिस मुन्नालाल अब मर चुका था . पुलिस ने जब उसके सामान की तालाशी ली तो उस सामान में टुडे मुड़े डेढ़ लाख रुपए और दो लाख रुपए की ऍफ़ डी निकली . यह बात पता चलते ही लावारिस मुन्नालाल के कई वारिस सामने आ गए .अब मुन्नालाल किसी का चचा था तो किसी का मामा .  बहुत विवादों के बाद मुनालाल को चिता नसीब हुई . अगले दिन अखवार में एक विज्ञापन छपा था .

बड़े दुःख के साथ सूचित करना पड़ रहा है हमारे  पूज्य  श्री मुन्नालाल जी सेवानिवृत डाक बाबू का स्वर्गवास हो गया है . उनका दसवां संस्कार बाग़ ब्रिग्तान में और तेहरवी हमारे निवास में होगी - शोकाकुल राम लाल भतीजा ,जवाहर लाल भांजा .

............................. और पैसे ने रिश्तेदारों को रिश्तेदारी निभाना सिखा दिया .

9 टिप्‍पणियां:

  1. ............................. और पैसे ने रिश्तेदारों को रिश्तेदारी निभाना सिखा दिया ......

    यही तो दुनिया की रीति बन के रह गयी है ... स्वार्थ लाइ करहिं सब प्रीती

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  2. सर्वे गुणा: कंचनमाश्रयन्ति।
    जिन्दा रहते मुन्नालाल एक खाली लिफ़ाफ़ा थे और an empty purse is a heavy curse.

    कटु सच्चाई।

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  3. ये जीवन है...
    मार्मिक प्रस्तुति

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  4. सही बात तो यही है. अर्थ हर एक चीज पर हावी है.. रिश्तों पर भी.

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  5. बहुत ही संवेदनशील लिखा है ...
    पैसा क्या क्या न करवा दे ... पर इनको ये पता नही जिस पैसे की खातिर ये रिश्तेदार मिल रहे हैं वही पैसा एक दिन इनको भी इसी मुकाम पर ले आएगा ...

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  6. पेसॊ के लिये लोग आज अपनी मां बहन को भी तो बेच रहे है जी.... आज का इंसान (हेवान) पेसॊ के लिये अपनी मां को भी धोखा दे रहा है, बहुत संवेंदना शील लेख लिखा

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  7. यही जीवन की सच्चाई है जो हर मोहल्ले में कही न कहीं मौजूद है भाई धीरु सिंह जी ! आपकी संवेदनशीलता अच्छी लगी ! शुभकामनायें !

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आप बताये क्या मैने ठीक लिखा